भारत में सिक्कों की उत्पत्ति(Origin of Coins in India)
मनुष्य की विकसित अवस्था के सन्दर्भ में मुद्रा एक मानक बनकर हमारे सामने आया। यह विनिमय का एक माध्यम है। इसका आविष्कार मनुष्य के विकसित और परिष्कृत विचार का प्रतीक है जिससे वह उन वस्तुओं को प्राप्त करता है जिसकी उसे आवश्यकता होती है। स्पेन्सर महोदय का मत है कि समय के विकास और कार्य विभाजन के फलस्वरूप प्रत्येक व्यक्ति भोजन अर्जन एवं शस्त्र निर्माण के कार्य में लग गया। जिसके फलस्वरूप कार्य विभाजन से समाज को सुविधा हुई। जैसे-जैसे समाज विकसित हुआ वैसे-वैसे उनकी आवश्यकताओं में वृद्धि हुई। एक दूसरे के सम्पर्क में आने के कारण वस्तुओं के प्रति इच्छायें प्रबल हुई होंगी। इसके कारण अपनी वस्तु को दूसरे को देकर उस वस्तु को पाने का विचार आया। इस प्रकार समाज में वस्तु-विनिमय का प्रचलन शुरू हुआ। वैदिक काल में वस्तु-विनिमय का प्रलचन था। गाय को भी वस्तु-विनिमय का माध्यम माना गया। विद्वानों ने इस वस्तु-विनिमय को सिक्कों की उत्पत्ति का आरम्भ माना है। कालान्तर में इसमें कुछ कठिनाइयाँ आयीं कि वस्तुओं का वास्तविक एवं पारस्परिक मूल्य कैसे निश्चित किया जाए? मानव सभ्यता के विकास के साथ-साथ लोगों में धातुओं के प्रति आकर्षण बढ़ा जिसके कारण मानव ने धातु की बनी वस्तुओं को संगृहीत करना आरम्भ किया। सिक्कों के विकास की यह सबसे महत्वपूर्ण समय था जब धातु का प्रयोग सिक्कों के रूप में किया जाने लगा। हड़प्पा सभ्यता के पुरास्थलों से धातु के अवशेष मिलते हैं। धातु के प्रयोग से व्यापार अत्यन्त सुगम हो गया। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि सिक्कों के विकास में मनुष्य का योगदान मुख्य रहा। आगे चलकर शासक वर्ग ने इसे अपने अधिकार में ले लिया। प्रो.वासुदेव उपाध्याय के अनुसार सोने को मूल्यवान् समझ कर लोग कोई अन्य सस्ती वस्तु ढूंढने लगे जिससे सस्ती वस्तु खरीदी जा सके। इस तरह चाँदी और ताँबे के सिक्के का प्रयोग हुआ। डा.परमेश्वरी लाल गुप्त के अनुसार- ‘कालान्तर में कुछ वस्तुओं को अधिक महत्व दिया जाने लगा और उनका मूल्य ऊँचा आंका गया। इस प्रकार उन वस्तुओं को विनिमय का माध्यम बना लिया गया जिनका एक मानक स्वरूप तैयार कर लिया गया। इस प्रकार ईकाई मूल्य की धारणा समाज में फैल गई। जिससे सर्वप्रथम मुद्रा का विकास हुआ। मुद्रा की प्राचीनता एवं उद्भव- भारत में मुद्रा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में मुद्राशास्त्रियों में व्यापक मतभेद रहा है। इस मतभेद का कारण है कि मुद्रा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में जो साक्ष्य प्राप्त होते हैं, वे बहुत ही कम हैं। इसके अतिरिक्त स्पष्टता के अभाव में विद्वानों के समक्ष कठिनाइयाँ उत्पन्न होतीं हैं। इसके अतिरिक्त प्रश्न उठता है कि क्या भारतीय सिक्के स्वतंत्र रूप से निर्मित किये गये या किसी अन्य देश का अनुकरण के आधार पर निर्मित किया गया। आज से दो-तीन दशक पूर्व मुद्रा की उत्पत्ति का विषय अत्यन्त विवादास्पद रहा है। संभवतः व्यापारियों ने व्यापार की सुविधा एवं लेन-देन में सुगमता हेतु सर्वप्रथम सिक्कों का प्रवर्तन किया। प्रारम्भ में शासक वर्ग इस दिशा में उदासीन रहा, लेकिन बाद में इसे अपने अधिकार में ले लिया। मौर्य काल के समय यह राज्य के नियंत्रण में आया। मुद्रा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विद्वानों ने अनेक अवधारणायें प्रस्तुत की हैं। भारत में मुद्रा की प्राचीनता के दो सिद्धान्त मुख्य रूप से प्रचलित हैं- 1. विदेशी उत्पत्ति का सिद्धान्त। 2. स्वदेशी उत्पत्ति का सिद्धान्त। विदेशी उत्पत्ति के सिद्धान्त को तीन भागों में बाँट सकते हैं- (क) यूनानी उत्पत्ति का सिद्धान्त (ख) ईरानी उत्पत्ति का सिद्धान्त (ग) बेबीलोनियन उत्पत्ति का सिद्धान्त (क) यूनानी उत्पत्ति का सिद्धान्त – प्रख्यात विद्वान विल्सन और प्रिंसेप के अनुसार भारत में सिक्कों का प्रचलन यूनानी आक्रमण के बाद में हुआ। विल्सन का मत है कि भारतीय लोग विनिमय के लिए चिन्हरहित धातु के टुकड़ों का प्रयोग करते थे। धातु-खण्ड़ों पर चिन्ह बनाकर मुद्रा के रूप में प्रयोग करने का आरम्भ बैक्ट्रिया और रोम के साथ व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित हो जाने के बाद हुआ। प्रिसेंप महोदय ने इस सम्बन्ध में अपना मत व्यक्त करते हुए कहा है कि ‘इस बात में सन्देह है कि सिकन्दर के आगमन के पूर्व भारत में सिक्के प्रचलित थे।’ उन्होंने अपने मत को औदुम्बर मुद्रा तथा यूनानी सिक्के की समानता पर आधारित किया। खेद है कि इन विद्वानों ने आहत (चिन्हित) सिक्कों के प्रचलन पर तनिक भी ध्यान नहीं दिया। यद्यपि प्रिसेप महोदय ने अपने मत में परिवर्तन किया और यह मान लिया कि यूनानियों के आगमन के पूर्व भारतीय धातु-खण्ड़ों का प्रयोग विनिमय के रूप में करते थे जो चिन्हरहित होते थे और उन धातु खण्ड़ों का चिन्हांकित होना यूनानियों के भारत आगमन के बाद ही संभव हो पाया था। भारतीय सिक्के राष्ट्रीय हैं तथा उनका निर्माण स्वदेशी था। आलोचना- वर्तमान समय में प्रिंसेप और विल्सन के विचारों को मुद्राशास्त्रियों ने आधारहीन बताया है। विद्वानों ने निम्नलिखित आधार पर इस अवधारणा का खण्डन किया है- भारत की प्राचीनतम मुद्रा आहत मुद्रा है जिसे धातु खण्डों पर पीटकर चिन्ह बनाये जाते थे। इन आहत मुद्राओं एवं यूनानी मुद्राओं में अनेक अन्तर स्पष्ट परिलक्षित होते हैं। 2. यूनानी सिक्के वृत्ताकार हैं जबकि भारतीय आहत मुद्राएँ वृत्ताकार, चैकोर, अण्डाकार आदि कई आकारों में निर्मित होते थे। इनके निश्चित आकार में न होने का कारण यह था कि इनके किनारे से धातु के टुकड़ों को काटकर एक निश्चित माप और तौल में निर्मित किया जाता था। 3. यूनानी मुद्राओं पर मुद्रा लेख का अंकन मिलता है जबकि भारतीय आहत मुद्रायें लेख रहित हैं। 4. यूनानी मुद्रा सामान्यतः 67 ग्रेन का होता था। जबकि आहत मुद्रा की तौल सामान्यतः 56 ग्रेन होती थी। 5. यूनानी मुद्रा के अग्रभाग पर राजा की आकृति और पृष्ठभाग पर यूनानी देवी-देवताओं के चित्र अंकित हैं। इसके विपरीत भारतीय मुद्राओं पर कोई निश्चित चिन्ह न होकर चिन्हों के समूह अंकित हैं। यूनान के आयोनियन समुद्र तट से प्राप्त कुछ प्राचीन मुद्राओं पर आहत चिन्ह बने अवश्य हैं, लेकिन ये चिन्ह भारतीय चिन्हों से सर्वथा भिन्न हैं। इन मुद्राओं पर आहत चिन्ह केवल पृष्ठभाग पर एवं बहुत ही कम मात्रा में हैं। ये या तो वृत्ताकार या लम्बे आकार की हैं। दूसरी बात यह है कि आयोनियन समुद्र तट की मुद्रायें गिलट (इलेक्ट्रम) की बनीं हैं। ये मुद्रायें भारतीय क्षेत्र से इतनी दूर की धरती से भी नहीं मिलती हैं। अतः इनसे भारतीय...