Ancient History

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भारत में सिक्कों की उत्पत्ति(Origin of Coins in India)

मनुष्य की विकसित अवस्था के सन्दर्भ में मुद्रा एक मानक बनकर हमारे सामने आया। यह विनिमय का एक माध्यम है। इसका आविष्कार मनुष्य के विकसित और परिष्कृत विचार का प्रतीक है जिससे वह उन वस्तुओं को प्राप्त करता है जिसकी उसे आवश्यकता होती है। स्पेन्सर महोदय का मत है कि समय के विकास और कार्य विभाजन के फलस्वरूप प्रत्येक व्यक्ति भोजन अर्जन एवं शस्त्र निर्माण के कार्य में लग गया। जिसके फलस्वरूप कार्य विभाजन से समाज को सुविधा हुई। जैसे-जैसे समाज विकसित हुआ वैसे-वैसे उनकी आवश्यकताओं में वृद्धि हुई। एक दूसरे के सम्पर्क में आने के कारण वस्तुओं के प्रति इच्छायें प्रबल हुई होंगी। इसके कारण अपनी वस्तु को दूसरे को देकर उस वस्तु को पाने का विचार आया। इस प्रकार समाज में वस्तु-विनिमय का प्रचलन शुरू हुआ। वैदिक काल में वस्तु-विनिमय का प्रलचन था। गाय को भी वस्तु-विनिमय का माध्यम माना गया।   विद्वानों ने इस वस्तु-विनिमय को सिक्कों की उत्पत्ति का आरम्भ माना है। कालान्तर में इसमें कुछ कठिनाइयाँ आयीं कि वस्तुओं का वास्तविक एवं पारस्परिक मूल्य कैसे निश्चित किया जाए? मानव सभ्यता के विकास के साथ-साथ लोगों में धातुओं के प्रति आकर्षण बढ़ा जिसके कारण मानव ने धातु की बनी वस्तुओं को संगृहीत करना आरम्भ किया। सिक्कों के विकास की यह सबसे महत्वपूर्ण समय था जब धातु का प्रयोग सिक्कों के रूप में किया जाने लगा। हड़प्पा सभ्यता के पुरास्थलों से धातु के अवशेष मिलते हैं। धातु के प्रयोग से व्यापार अत्यन्त सुगम हो गया। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि सिक्कों के विकास में मनुष्य का योगदान मुख्य रहा। आगे चलकर शासक वर्ग ने इसे अपने अधिकार में ले लिया। प्रो.वासुदेव उपाध्याय के अनुसार सोने को मूल्यवान् समझ कर लोग कोई अन्य सस्ती वस्तु ढूंढने लगे जिससे सस्ती वस्तु खरीदी जा सके। इस तरह चाँदी और ताँबे के सिक्के का प्रयोग हुआ। डा.परमेश्वरी लाल गुप्त के अनुसार- ‘कालान्तर में कुछ वस्तुओं को अधिक महत्व दिया जाने लगा और उनका मूल्य ऊँचा आंका गया। इस प्रकार उन वस्तुओं को विनिमय का माध्यम बना लिया गया जिनका एक मानक स्वरूप तैयार कर लिया गया। इस प्रकार ईकाई मूल्य की धारणा समाज में फैल गई। जिससे सर्वप्रथम मुद्रा का विकास हुआ। मुद्रा की प्राचीनता एवं उद्भव- भारत में मुद्रा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में मुद्राशास्त्रियों में व्यापक मतभेद रहा है। इस मतभेद का कारण है कि मुद्रा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में जो साक्ष्य प्राप्त होते हैं, वे बहुत ही कम हैं। इसके अतिरिक्त स्पष्टता के अभाव में विद्वानों के समक्ष कठिनाइयाँ उत्पन्न होतीं हैं। इसके अतिरिक्त प्रश्न उठता है कि क्या भारतीय सिक्के स्वतंत्र रूप से निर्मित किये गये या किसी अन्य देश का अनुकरण के आधार पर निर्मित किया गया। आज से दो-तीन दशक पूर्व मुद्रा की उत्पत्ति का विषय अत्यन्त विवादास्पद रहा है। संभवतः व्यापारियों ने व्यापार की सुविधा एवं लेन-देन में सुगमता हेतु सर्वप्रथम सिक्कों का प्रवर्तन किया। प्रारम्भ में शासक वर्ग इस दिशा में उदासीन रहा, लेकिन बाद में इसे अपने अधिकार में ले लिया। मौर्य काल के समय यह राज्य के नियंत्रण में आया। मुद्रा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विद्वानों ने अनेक अवधारणायें प्रस्तुत की हैं। भारत में मुद्रा की प्राचीनता के दो सिद्धान्त मुख्य रूप से प्रचलित हैं- 1.            विदेशी उत्पत्ति का सिद्धान्त। 2.            स्वदेशी उत्पत्ति का सिद्धान्त। विदेशी उत्पत्ति के सिद्धान्त को तीन भागों में बाँट सकते हैं- (क) यूनानी उत्पत्ति का सिद्धान्त (ख) ईरानी उत्पत्ति का सिद्धान्त (ग) बेबीलोनियन उत्पत्ति का सिद्धान्त  (क) यूनानी उत्पत्ति का सिद्धान्त – प्रख्यात विद्वान विल्सन और प्रिंसेप के अनुसार भारत में सिक्कों का प्रचलन यूनानी आक्रमण के बाद में हुआ। विल्सन का मत है कि भारतीय लोग विनिमय के लिए चिन्हरहित धातु के टुकड़ों का प्रयोग करते थे। धातु-खण्ड़ों पर चिन्ह बनाकर मुद्रा के रूप में प्रयोग करने का आरम्भ बैक्ट्रिया और रोम के साथ व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित हो जाने के बाद हुआ। प्रिसेंप महोदय ने इस सम्बन्ध में अपना मत व्यक्त करते हुए कहा है कि ‘इस बात में सन्देह है कि सिकन्दर के आगमन के पूर्व भारत में सिक्के प्रचलित थे।’ उन्होंने अपने मत को औदुम्बर मुद्रा तथा यूनानी सिक्के की समानता पर आधारित किया। खेद है कि इन विद्वानों ने आहत (चिन्हित) सिक्कों के प्रचलन पर तनिक भी ध्यान नहीं दिया। यद्यपि प्रिसेप महोदय ने अपने मत में परिवर्तन किया और यह मान लिया कि यूनानियों के आगमन के पूर्व भारतीय धातु-खण्ड़ों का प्रयोग विनिमय के रूप में करते थे जो चिन्हरहित होते थे और उन धातु खण्ड़ों का चिन्हांकित होना यूनानियों के भारत आगमन के बाद ही संभव हो पाया था। भारतीय सिक्के राष्ट्रीय हैं तथा उनका निर्माण स्वदेशी था। आलोचना- वर्तमान समय में प्रिंसेप और विल्सन के विचारों को मुद्राशास्त्रियों ने आधारहीन बताया है। विद्वानों ने निम्नलिखित आधार पर इस अवधारणा का खण्डन किया है- भारत की प्राचीनतम मुद्रा आहत मुद्रा है जिसे धातु खण्डों पर पीटकर चिन्ह बनाये जाते थे। इन आहत मुद्राओं एवं यूनानी मुद्राओं में अनेक अन्तर स्पष्ट परिलक्षित होते हैं।        2.   यूनानी सिक्के वृत्ताकार हैं जबकि भारतीय आहत मुद्राएँ वृत्ताकार, चैकोर, अण्डाकार आदि कई आकारों में निर्मित होते थे। इनके निश्चित आकार में न होने का कारण यह था कि इनके किनारे से धातु के टुकड़ों को काटकर एक निश्चित माप और तौल में निर्मित किया जाता था।       3.      यूनानी मुद्राओं पर मुद्रा लेख का अंकन मिलता है जबकि भारतीय आहत मुद्रायें लेख रहित हैं।      4.       यूनानी मुद्रा सामान्यतः 67 ग्रेन का होता था। जबकि आहत मुद्रा की तौल सामान्यतः 56 ग्रेन होती थी।      5.       यूनानी मुद्रा के अग्रभाग पर राजा की आकृति और पृष्ठभाग पर यूनानी देवी-देवताओं के चित्र अंकित हैं। इसके विपरीत भारतीय मुद्राओं पर कोई निश्चित चिन्ह न होकर चिन्हों के समूह अंकित हैं। यूनान के आयोनियन समुद्र तट से प्राप्त कुछ प्राचीन मुद्राओं पर आहत चिन्ह बने अवश्य हैं, लेकिन ये चिन्ह भारतीय चिन्हों से सर्वथा भिन्न हैं। इन मुद्राओं पर आहत चिन्ह केवल पृष्ठभाग पर एवं बहुत ही कम मात्रा में हैं। ये या तो वृत्ताकार या लम्बे आकार की हैं। दूसरी बात यह है कि आयोनियन समुद्र तट की मुद्रायें गिलट (इलेक्ट्रम) की बनीं हैं। ये मुद्रायें भारतीय क्षेत्र से इतनी दूर की धरती से भी नहीं मिलती हैं। अतः इनसे भारतीय...

भारत में सिक्कों की उत्पत्ति(Origin of Coins in India)

मनुष्य की विकसित अवस्था के सन्दर्भ में मुद्रा एक मानक बनकर हमारे सामने आया। यह विनिमय का एक माध्यम है। इसका आविष्कार मनुष्य के विकसित और परिष्कृत विचार का प्रतीक है जिससे वह उन वस्तुओं को प्राप्त करता है जिसकी उसे आवश्यकता होती है। स्पेन्सर महोदय का मत है कि समय के विकास और कार्य विभाजन के फलस्वरूप प्रत्येक व्यक्ति भोजन अर्जन एवं शस्त्र निर्माण के कार्य में लग गया। जिसके फलस्वरूप कार्य विभाजन से समाज को सुविधा हुई। जैसे-जैसे समाज विकसित हुआ वैसे-वैसे उनकी आवश्यकताओं में वृद्धि हुई। एक दूसरे के सम्पर्क में आने के कारण वस्तुओं के प्रति इच्छायें प्रबल हुई होंगी। इसके कारण अपनी वस्तु को दूसरे को देकर उस वस्तु को पाने का विचार आया। इस प्रकार समाज में वस्तु-विनिमय का प्रचलन शुरू हुआ। वैदिक काल में वस्तु-विनिमय का प्रलचन था। गाय को भी वस्तु-विनिमय का माध्यम माना गया।   विद्वानों ने इस वस्तु-विनिमय को सिक्कों की उत्पत्ति का आरम्भ माना है। कालान्तर में इसमें कुछ कठिनाइयाँ आयीं कि वस्तुओं का वास्तविक एवं पारस्परिक मूल्य कैसे निश्चित किया जाए? मानव सभ्यता के विकास के साथ-साथ लोगों में धातुओं के प्रति आकर्षण बढ़ा जिसके कारण मानव ने धातु की बनी वस्तुओं को संगृहीत करना आरम्भ किया। सिक्कों के विकास की यह सबसे महत्वपूर्ण समय था जब धातु का प्रयोग सिक्कों के रूप में किया जाने लगा। हड़प्पा सभ्यता के पुरास्थलों से धातु के अवशेष मिलते हैं। धातु के प्रयोग से व्यापार अत्यन्त सुगम हो गया। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि सिक्कों के विकास में मनुष्य का योगदान मुख्य रहा। आगे चलकर शासक वर्ग ने इसे अपने अधिकार में ले लिया। प्रो.वासुदेव उपाध्याय के अनुसार सोने को मूल्यवान् समझ कर लोग कोई अन्य सस्ती वस्तु ढूंढने लगे जिससे सस्ती वस्तु खरीदी जा सके। इस तरह चाँदी और ताँबे के सिक्के का प्रयोग हुआ। डा.परमेश्वरी लाल गुप्त के अनुसार- ‘कालान्तर में कुछ वस्तुओं को अधिक महत्व दिया जाने लगा और उनका मूल्य ऊँचा आंका गया। इस प्रकार उन वस्तुओं को विनिमय का माध्यम बना लिया गया जिनका एक मानक स्वरूप तैयार कर लिया गया। इस प्रकार ईकाई मूल्य की धारणा समाज में फैल गई। जिससे सर्वप्रथम मुद्रा का विकास हुआ। मुद्रा की प्राचीनता एवं उद्भव- भारत में मुद्रा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में मुद्राशास्त्रियों में व्यापक मतभेद रहा है। इस मतभेद का कारण है कि मुद्रा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में जो साक्ष्य प्राप्त होते हैं, वे बहुत ही कम हैं। इसके अतिरिक्त स्पष्टता के अभाव में विद्वानों के समक्ष कठिनाइयाँ उत्पन्न होतीं हैं। इसके अतिरिक्त प्रश्न उठता है कि क्या भारतीय सिक्के स्वतंत्र रूप से निर्मित किये गये या किसी अन्य देश का अनुकरण के आधार पर निर्मित किया गया। आज से दो-तीन दशक पूर्व मुद्रा की उत्पत्ति का विषय अत्यन्त विवादास्पद रहा है। संभवतः व्यापारियों ने व्यापार की सुविधा एवं लेन-देन में सुगमता हेतु सर्वप्रथम सिक्कों का प्रवर्तन किया। प्रारम्भ में शासक वर्ग इस दिशा में उदासीन रहा, लेकिन बाद में इसे अपने अधिकार में ले लिया। मौर्य काल के समय यह राज्य के नियंत्रण में आया। मुद्रा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विद्वानों ने अनेक अवधारणायें प्रस्तुत की हैं। भारत में मुद्रा की प्राचीनता के दो सिद्धान्त मुख्य रूप से प्रचलित हैं- 1.            विदेशी उत्पत्ति का सिद्धान्त। 2.            स्वदेशी उत्पत्ति का सिद्धान्त। विदेशी उत्पत्ति के सिद्धान्त को तीन भागों में बाँट सकते हैं- (क) यूनानी उत्पत्ति का सिद्धान्त (ख) ईरानी उत्पत्ति का सिद्धान्त (ग) बेबीलोनियन उत्पत्ति का सिद्धान्त  (क) यूनानी उत्पत्ति का सिद्धान्त – प्रख्यात विद्वान विल्सन और प्रिंसेप के अनुसार भारत में सिक्कों का प्रचलन यूनानी आक्रमण के बाद में हुआ। विल्सन का मत है कि भारतीय लोग विनिमय के लिए चिन्हरहित धातु के टुकड़ों का प्रयोग करते थे। धातु-खण्ड़ों पर चिन्ह बनाकर मुद्रा के रूप में प्रयोग करने का आरम्भ बैक्ट्रिया और रोम के साथ व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित हो जाने के बाद हुआ। प्रिसेंप महोदय ने इस सम्बन्ध में अपना मत व्यक्त करते हुए कहा है कि ‘इस बात में सन्देह है कि सिकन्दर के आगमन के पूर्व भारत में सिक्के प्रचलित थे।’ उन्होंने अपने मत को औदुम्बर मुद्रा तथा यूनानी सिक्के की समानता पर आधारित किया। खेद है कि इन विद्वानों ने आहत (चिन्हित) सिक्कों के प्रचलन पर तनिक भी ध्यान नहीं दिया। यद्यपि प्रिसेप महोदय ने अपने मत में परिवर्तन किया और यह मान लिया कि यूनानियों के आगमन के पूर्व भारतीय धातु-खण्ड़ों का प्रयोग विनिमय के रूप में करते थे जो चिन्हरहित होते थे और उन धातु खण्ड़ों का चिन्हांकित होना यूनानियों के भारत आगमन के बाद ही संभव हो पाया था। भारतीय सिक्के राष्ट्रीय हैं तथा उनका निर्माण स्वदेशी था। आलोचना- वर्तमान समय में प्रिंसेप और विल्सन के विचारों को मुद्राशास्त्रियों ने आधारहीन बताया है। विद्वानों ने निम्नलिखित आधार पर इस अवधारणा का खण्डन किया है- भारत की प्राचीनतम मुद्रा आहत मुद्रा है जिसे धातु खण्डों पर पीटकर चिन्ह बनाये जाते थे। इन आहत मुद्राओं एवं यूनानी मुद्राओं में अनेक अन्तर स्पष्ट परिलक्षित होते हैं।        2.   यूनानी सिक्के वृत्ताकार हैं जबकि भारतीय आहत मुद्राएँ वृत्ताकार, चैकोर, अण्डाकार आदि कई आकारों में निर्मित होते थे। इनके निश्चित आकार में न होने का कारण यह था कि इनके किनारे से धातु के टुकड़ों को काटकर एक निश्चित माप और तौल में निर्मित किया जाता था।       3.      यूनानी मुद्राओं पर मुद्रा लेख का अंकन मिलता है जबकि भारतीय आहत मुद्रायें लेख रहित हैं।      4.       यूनानी मुद्रा सामान्यतः 67 ग्रेन का होता था। जबकि आहत मुद्रा की तौल सामान्यतः 56 ग्रेन होती थी।      5.       यूनानी मुद्रा के अग्रभाग पर राजा की आकृति और पृष्ठभाग पर यूनानी देवी-देवताओं के चित्र अंकित हैं। इसके विपरीत भारतीय मुद्राओं पर कोई निश्चित चिन्ह न होकर चिन्हों के समूह अंकित हैं। यूनान के आयोनियन समुद्र तट से प्राप्त कुछ प्राचीन मुद्राओं पर आहत चिन्ह बने अवश्य हैं, लेकिन ये चिन्ह भारतीय चिन्हों से सर्वथा भिन्न हैं। इन मुद्राओं पर आहत चिन्ह केवल पृष्ठभाग पर एवं बहुत ही कम मात्रा में हैं। ये या तो वृत्ताकार या लम्बे आकार की हैं। दूसरी बात यह है कि आयोनियन समुद्र तट की मुद्रायें गिलट (इलेक्ट्रम) की बनीं हैं। ये मुद्रायें भारतीय क्षेत्र से इतनी दूर की धरती से भी नहीं मिलती हैं। अतः इनसे भारतीय...

सिन्धु सभ्यता में आर्थिक जीवन(Economic life in the Indus Valley Civilization)

प्राचीन भारतवर्ष वर्तमान भारत से बहुत बड़ा था। उसकी सीमा में वर्तमान पाकिस्तान, भारत और बांग्लादेश सम्मिलित था। वैदिक साहित्य में देश के रूप में भारत का उल्लेख नहीं मिलता। इसका उल्लेख सर्वप्रथम पुराणों में मिलता है।                 उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमादे्रश्चैव दक्षिणम्।                 वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः।। (विष्णु पुराण) इस नाम का सबसे पहला आभिलेखिक उल्लेख खारवेल के हाथीगुम्फा अभिलेख में मिलता है। यथा-                 दसमे च वसे दंड संधी सा (ममयो) भरदवस पठानं। अशोक के अभिलेखों में इसे जम्बूद्वीप कहा गया है। सिन्धु सभ्यता की भौगोलिक स्थिति एवं उन्नत आर्थिक अवस्थाओं के पीछे उन क्षेत्रों की तत्कालीन पारिस्थितिकी, उनका समुन्नत तकनीकी ज्ञान, शीघ्रगमन के लिए पहियों वाली गाड़ियों का प्रयोग और प्राकृतिक शथ्कत से पूर्ण संसाधनों के विकास ने महत्वपूर्ण योग प्रदान किया होगा। उत्खननों से प्राप्त पुरा सामग्रियों के तिथि निर्धारण के फलस्वरूप भारतीय सांस्कृतिक और आर्थिक इतिहास के विकास के अध्ययन को एक तैथिक आधार प्राप्त हुआ। मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा की विशालता एवं इसकी समृद्धि इस बात को स्पष्ट करती है कि सिन्धु सभ्यता के लोगों की आर्थिक स्थिति संतोषजनक थी। सैंधव सभ्यता के समृद्ध आर्थिक जीवन में कृषि, पशुपालन, विभिन्न प्रकार के उद्योग-धंधों तथा व्यापार-वाणिज्य का प्रमुख योगदान था। कृषकों के अतिरिक्त उत्पादन और व्यापार-वाणिज्य के विकास के कारण ही इस नगरीय सभ्यता का विकास हुआ था। कृषि पर आधारित अनाज उत्पादन की समुन्नत तकनीकों और विशेष शिल्पों का जब बहुत अधिक प्रयोग प्रारम्भ होता है तब किसान इतना अधिक अन्न उत्पन्न करने लगता है  िकवह उससे केवल अपना ही भरण-पोषण नहीं करता अपितु शासक, पुरोहित, सैनिक एवं शासक और वहाँ के निवासी और व्यापारी, शिल्पी भी उसके उत्पाद से ही अपनी-अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। कृषि – प्राचीन भारत की भौगोलिक बनावट ही कृषि और कृषिपरक क्रियाकलापों के विकास और विस्तार के लिए इतनी अनुकूल थी कि यहाँ अत्यन्त प्रारम्भ में ही श्री गणेश न हो जाता तो कोई आश्चर्य की बात होती। आज की अपेक्षा सिंधु प्रदेश की भूमि पहले बहुत ऊपजाऊ थी। ई.पू. चैथी सदी में सिकंदर के एक इतिहासकार ने कहा था कि सिंधु की गणना इस देश के उपजाऊ क्षेत्रों में की जाती थी। पूर्व काल में प्राकृतिक वनस्पतियों बहुत अधिक थीं, जिसके कारण यहाँ अच्छी वर्षा होती थी। पकी ईंटों की सुरक्षा-प्राचीरों से संकेत मिलता है कि नदियों में बाढ़ प्रतिवर्ष आती थी। सिंधु तथा उसकी सहायक नदियों द्वारा प्रति वर्ष लायी गयी उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी इस क्षेत्र की उर्वरता को बहुत बढ़ा देती थी, जो कृषि के लिये महत्त्वपूर्ण थी। यहाँ के लोग बाढ़ के उतर जाने के बाद नवम्बर के महीने में बाढ़ वाले मैदानों में बुआई कर देते थे और अगली बाढ़ के आने से पहले अप्रैल के महीने में गेहूँ तथा जौ की फसल काट लेते थे। सिंधु नदी घाटी के उपजाऊ मैदानों में मुख्यतः गेहूँ और जौ का उत्पादन किया जाता था। अभी तक नौ फसलों की पहचान की गयी है। गेहूँ बहुतायत में उगाया जाता था। जौ की दो और गेहूँ की तीन किस्में उपजाई जाती थीं। गेहूँ के बीज की दो किस्में स्परोकोकम तथा कम्पेस्टस उत्खनन में प्राप्त हुई हैं। बनावली में मिला जौ उन्नत किस्म का है। चावल की खेती केवल गुजरात (लोथल) और सम्भवतः राजस्थान में की जाती थी। लोथल से धान तथा बाजरे की खेती के अवशेष मिले हैं। इसके अलावा राई, खजूर, सरसों, तिल एवं कपास की भी खेती होती थी। सम्भवतः सबसे पहले कपास यहीं पैदा की गयी, इसीलिये यूनानी इस प्रदेश को ‘ सिंडन ’ कहते थे। यही नहीं, वे अनेक प्रकार के फल व सब्जियों भी उपजाते थे। हड़प्पाई पुरास्थलों के उत्खनन में पीपल, खजूर, नीम, नींबू, अनार एवं केला आदि के प्रमाण मिले हैं। इस समय खेती के कार्यों में प्रस्तर एवं काँसे के बने औजार प्रयुक्त होते थे। यहाँ कोई फावड़ा या हल का फाल तो नहीं मिला है, किन्तु कालीबंगा की प्राक् हड़प्पा सभ्यता के स्तर से जो कूट (हलरेखा) मिले हैं, उनसे स्पष्ट है कि राजस्थान में इस काल में हलों द्वारा खेतो की जुताई की जाती थी। धातु के हल के अवशेष अभी तक नहीं मिले हैं परन्तु इसकी उच्च कोटि की जुताई में सन्देह नहीं किया जा सकता है। बणावली में मिट्टी का  बना हुआ हल-जैसा एक खिलौना मिला है। डी, डी, कौशाम्बी महोदय का मत है कि सैन्धव लोगों को भारी हल का ज्ञान नहीं था। इस मत को इस प्रकार खण्डित किया जा सकता है-प्रथम बहावलपुर एवं बणावली से मिट्टी के बने हल का मिलना। दूसरे यह मत ऐसे भी खारिज हो जाता है कि बिना हल के गहरी जुताई नहीं किया जा सकता। यदि यह न हो तो अधिशेष नहीं निकल पायेगा और न ही नगरीकरण ही हो पायेगा। जबकि हम सभी जानते हैं कि  सैन्धव सभ्यता नगरीय सभ्यता थी। मेहरगढ़ (पाकिस्तान) से कृषि – गेहूँ, जौ, अंगूर एवं कपास का प्रमाण मिला है। सम्भवतः सिंचाई के लिये नदियों के जल का प्रयोग किया जाता था। जलाशयों एवं कुओं से भी सिंचाई किया जाता रहा होगा। फसलों की कटाई के लिये सम्भवतः पत्थर या काँसे की हँसिया का प्रयोग किया जाता था। मेहरगढ़ से हँसिया का साक्ष्य मिला है। अनाज रखने की टोकरियों के भी साक्ष्य मिले हैं। अतिरिक्त उत्पादन को राज्य द्वारा नियन्त्रित भंडार गृहों (कोठारों या अन्नागारों) में रखा जाता था। मोहनजोदड़ो से प्राप्त विशाल अन्नागार इसका प्रमाण है। अनाज को चूहों से बचाने के लिये मिट्टी की चूहेदानियों का प्रयोग किया जाता था। अनाज कूटने के लिये ओखली और मूसल का प्रयोग होता था। लोथल से आटा पीसने की पत्थर की चक्की (जाँता) के दो पाट मिले हैं। लोथल और रंगपुर से मिट्टी के कुछ बर्तनों में धान की भूसी मिली है। पशुपालन – सैंधव सभ्यता में कृषि के साथ-साथ पशुपालन का भी महत्त्वपूर्ण स्थान था। पशु कृषि एवं यातायात के साधन थे।मृद्भांडों तथा मुहरों पर बने चित्रों एवं अस्थि-अवशेषों से लगता है कि मुख्य पालतू पशुओं में डीलदार एवं बिना डील वाले बैल, भैंस, गाय, भेड़-बकरी, कुत्ते, गधे, खच्चर और सुअर आदि थे। हड़प्पाई लोग सम्भवतः बाघ, हाथी तथा गैंडे से भी परिचित थे, किन्तु हाथी व घोड़ा पालने के साक्ष्य प्रमाणित नहीं हो सके हैं। हड़प्पा से गधे की हड्उी प्राप्त हुई है। एस. आर. राव को...

सैन्धव सामाजिक जीवन(Saindhav Social Life)

सैन्धव सामाजिक जीवन मानव सभ्यता का आरम्भ भारत में ईसा से लगभग एक लाख वर्ष पूर्व हुआ। जब इस बात की चर्चा भारतीय शास्त्रों और पुराणों के आधार पर की जाती थी तो विदेशी ही नहीं भारतीय भी इसे मजाक मानते थे. लेकिन जब 1957 ई. में डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर, जिन्हें भारत में ‘पाषाण कला का पितामह’ कहा जाता है, ने भीमबेटिका या भीमबैठका (मध्य प्रदेश) के शैलाश्रय की खोज की। इस शैलाश्रय पुरास्थल से प्रागैतिहासिक काल में मानव के आवास के साक्ष्य प्राप्त होते हैं। भीमबैठका से प्राप्त औजारों एवं अन्य वस्तुओं का काल निर्धारण जब किया गया तब विश्व के पुरातत्त्वविदों को यह मानना पड़ा कि भारत में निश्चय ही ईसा में लगभग एक लाख वर्ष पूर्व मध्य प्रदेश के भीमबैठका में मानव निवास करता था। इतिहास में सिन्धु घाटी की सभ्यता के नाम से विख्यात हड़प्पा सभ्यता भारत की वह महान् सभ्यता है, जिसके आधार पर हम भारतीय गर्व से कह सकते हैं कि भारतीय स्त्री-पुरुषों ने बहुत ही सुनियोजित ढंग से नगरों में बसना आरम्भ कर दिया था। ग्रामों के साथ-साथ विशाल नगर स्थापित किये जा चुके थे और भौतिक साधनों की अधिकता से मानव-जीवन आनन्द एवं उल्लास से भर गया था। 1921ई. से पहले अतीत के खण्डहरों में दबी हुई इस सभ्यता का ज्ञान न होने से पूर्व यह माना जाता था कि भारतीय मानव विश्व सभ्यताओं की तुलना में बहुत बाद में सभ्य हुआ। भारतीयों के पास प्राचीनतम सभ्यता के रूप में ऋग्वैदिक संस्कृति का ही ज्ञान था। यह ऋग्वैदिक संस्कृति विश्व की प्राचीन सभ्यताओं-सुमेरियन, बेबीलोनियन, नील नदीघाटी की मिस्र सभ्यता से बहुत बाद की थी कि भारतीय मानव विश्व के अन्य स्रोतों की तुलना में जिन्दगी की कला में, रहन-सहन के साधनों में विद्वतापूर्ण तरक्की एक लम्बे सफर के बाद बहुत देर से कर पाया था। सिन्धु सभ्यता के इतिहास ने पूर्व न्यायाधीशों के निर्णयों को बदल दिया और यह साबित कर दिया कि भारत अपने उषाकाल में यौवन को प्राप्त कर चुका था। नव पाषाणकालीन संस्कृति की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता है- गैर-धात्विक उपकरण और कृषि की जानकारी के साथ ग्रामीण जीवन का विकास। माना जाता है कि मानव ने सर्वप्रथम जिस धातु को औजारों में प्रयुक्त किया, वह ताँबा था और इसका सबसे पहले प्रयोग करीब 5000 ई.पू. में किया गया। जिस काल में मनुष्य ने पत्थर और ताँबे के औजारों का साथ-साथ प्रयोग किया, उस काल को ‘ताम्र-पाषाणिक काल’ कहते हैं। भारत की ताम्रपाषाणिक संस्कृतियों में गैर-नगरीय और गैर-हड़प्पाई संस्कृतियों की गणना की जाती है। सर्वप्रथम इनका उदय दूसरी सहस्त्राब्दी ई.पू. में हुआ और जिनको अंत में लौह प्रयोक्ता संस्कृतियों ने विस्थापित कर दिया। तिथिक्रम के अनुसार भारत में ताम्रपाषाणिक बस्तियों की अनेक शाखाएँ हैं। कुछ तो प्राक् -हड़प्पाई है कुछ हड़प्पा संस्कृति के समकालीन हैं, और कुछ हड़प्पा के बाद की हैं। प्राक् हड़प्पाकालीन संस्कृति के अंतर्गत राजस्थान के कालीबंगा एवं हरियाणा के बनावली स्पष्टतः ताम्र-पाषाणिक अवस्था के हैं। कृषि का ज्ञान हो जाने के बाद प्राचीन कालीन मानव अधिकतर उस स्थान पर बसना पसन्द करते थे, जहाँ की भूमि कृषि के योग्य होती थी और सिंचाई की समुचित व्यवस्था होती थी। इसी कारण अधिकांश प्राचीन सभ्यताओं का विकास नई घाटी एवं उसके समीपवर्ती प्रदेशों में हुआ। सामाजिक जीवन – सिन्धु सभ्यता की लिपि अब तक न पढ़े आने के कारण सामाजिक जीवन के विषय में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता है। फिर भी सैंधव सभ्यता के विभिन्न स्थलों से पाये गये पुरावशेषों के आधार पर इस सभ्यता के सामाजिक जीवन, रहन-सहन आदि के बारे में कुछ अनुमान लगाया जा सकता है। सैन्धव समाज में सामाजिक स्तरीकरण था। विद्वान, पुरोहित, योद्धा, व्यापारी, श्रमिक आदि को वर्ण व्यवस्था का पूर्व रूप मान सकते हैं। भवनों के आकार-प्रकार एवं आर्थिक विषमता के आधार पर लगता है कि विश्व की अन्य सभ्यताओं की भाँति हडप्पाई समाज भी वर्ग-विभेद पर आधारित था। दूसरे रक्षा प्राचीरों से घिरे दुर्ग इस ओर संकेत करते हैं कि यहाँ सम्पन्न व्यक्ति (पुरोहित तथा शासक वर्ग) रहता था। निचले नगर क्षेत्र में व्यापारी, अधिकारी, शिल्पी, एवं सैनिक रहते थे। कृषक, कुम्भकार, बढ़ई, जुलाहे, शिल्पी, श्रमिक आदि सैन्धव समाज के अन्य वर्ग रहे होंगे। मोहनजोदडो से प्राप्त कुछ कक्षों को कुम्हारों की बस्ती माना जाता है। बणावली से प्राप्त व्यापारी एवं आभूषण निर्माता के मकान, लोथल से प्राप्त बाजार वाली गली एवं नौसारों से प्राप्त मुहरों से व्यापारी वर्ग का अस्तित्व प्रमाणित होता है। उच्च वर्ग के लोग मूल्यवान धातु-पत्थरों के आभूषण प्रयोग करते थे, जबकि निम्नवर्गीय लोगों के आभूषण मिट्टी, सीप एवं घोंघे के होते थे। विशाल भवनों के निकट मिलने वाले छोटे आवासों से स्पष्ट है कि समाज में वर्ग-विभाजन विद्यमान था। प्राप्त पुरावशेषों से हडप्पाई समाज में शासक, कुलीन वर्ग, विद्वान, व्यापारी तथा शिल्पकार, कृषक और श्रमिक जैसे विभिन्न वर्गों के अस्तित्व की सूचना मिलती है। दुर्ग के निकट श्रमिकों की झोपड़ियाँ मिली हैं। इन हड़प्पाई श्रमिक-बस्तियों के आधार पर ह्नाीलर महोदय ने समाज में दास प्रथा के अस्तित्व का अनुमान किया है। डी. एच. गार्डेन का मत है कि सैन्धव स्थलों के उत्खनन से कतिपय ऐसी मूर्तियाँ मिली हैं, जिनमें पुरूषों एवं स्त्रियों को अपने घुटनों को बाँहों से घेरकर बैठे हुए दिखाया गया है। उनके शिरों पर गोल टोपी भी है। ये मूर्तियाँ गुलामों की हैं। इससे स्पष्ट है कि सैन्धव समाज में दास प्रथा का प्रचलन रहा होगा।  यद्यपि कुछ पुराविद् इससे सहमत नहीं हैं। इस सभ्यता के लोग युद्धप्रिय कम, शांतिप्रिय अधिक थे। परिवार – सम्भवतः समाज की इकाई परिवार था। उत्खनन में प्राप्त विशाल भवनों के आधार पर अनुमान है कि बड़े परिवारों में अनेक व्यक्ति रहते होंगे। खुदाई में प्राप्त बहुसंख्यक नारी-मूर्तियों से लगता है कि प्राक् -आर्य संस्कृतियों की भाँति सैंधव समाज भी मातृसत्तात्मक था। परिवार समाज की सबसे छोटी इकाई थी, जिसमें पति-पत्नी उनके बच्चे होते थे। परिवार की देख-रेख, उनके भरण-पोषण आदि की व्यवस्था करना पति का कर्तव्य था। सैन्धव पुरास्थलों से प्राप्त स्त्री-मूर्तियाँ सिन्धु समाज की दो विशेषताओं की अभिव्यक्ति करती हैं, प्रथम स्त्री को भोग की वस्तु माना जाता था। द्वितीय स्त्री मूर्तियों से यह भी स्पष्ट होता है कि तत्कालीन समाज में स्त्रियाँ विभिन्न प्रकार के कार्यों को सम्पादित करती थीं और पुरुषों का सहयोग करती रही होगी। ऐसा लगता...

प्राचीन भारतीय अर्थशास्त्र पर पाश्चात्य अर्थशास्त्रियों के विचार(Western Economists’ Views on Ancient Indian Economics)

भारतीय अर्थशास्त्र की विशेषता यह है कि उसका सम्बन्ध विभिन्न ज्ञान की शाखाओं से जुड़ा रहा है। इससे ज्ञान की एकता का प्रतिबिम्ब परिलक्षित होता है। तर्क के रूप में आन्वीक्षिकी ,एवं प्रयोगात्मक रूप में ‘वार्ता’ का प्रयोग मनुष्य के दैनिक कार्यों में प्रयुक्त होता रहा है। उस समय भी ज्ञान प्राप्ति के लिए पृथक-पृथक परम्पराएँ थीं। उनमें दार्शनिक, आध्यात्मिक, आर्थिक, नीतिविषयक ज्ञान का समावेश था। इस सम्बन्धा में उशनस््, वृहस्पति, भारद्वाज, पराशर, आदि की परम्पराओं का उल्लेख हमें प्राप्त होता है। प्राचीन आचार्यों के आर्थिक विचार तत्कालीन धार्मिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक विचारों के विचित्र मिश्रण थे। इन्हीं विचारों के क्रम में पाश्चात्य अर्थशास्त्रियों ने उन्हें एक नया रूप देने का प्रयास किया। प्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक अरस्तू के समय से विचारों का नया स्वरूप सामने आया। अरस्तू को कुछ लेखकों ने प्रथम विश्लेषणात्मक अर्थशास्त्री बतलाया है। अपने ‘पालिटिक्स’ नामक सुप्रसिद्ध ग्रन्थ के प्रथम खण्ड में अरस्तू ने अर्थशास्त्र की परिभाषा तथा इसके विषय-क्षेत्र के सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त किये हैं। अरस्तू ने अर्थशास्त्र को ‘गृह प्रबन्ध’ का विज्ञान बताया है।  उनके अनुसार- पूर्ति विभाग का सम्बन्ध विनिमय तथा धन प्राप्ति से था। प्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक जीवों ने भी अपनी ‘इकोनामिक्स’ नामक पुस्तक में अर्थशास्त्र को वह विज्ञान बताया था, जो गृह प्रबन्धन की समस्याओं का अध्ययन एवं मूल्यांकन करता है। मध्यकाल में आर्थिक विचारों का स्वरूप कुछ और ही था। ईसाई धर्म के प्रचार के कारण अर्थशास्त्र पर धर्मशास्त्र की अधिक छाप पड़ी। अतः इसे विशेष महत्व नहीं दी गई। फलतः आर्थिक विचारों के विकास का आकलन नहीं किया जा सका। मध्यकालीन चर्च पादरियों की विचारधारा धन प्राप्ति के प्रतिकूल थी। तत्कालीन विचारकों ने जीवन के आध्यात्मिक पक्ष पर अधिक बल दिया, आर्थिक पक्ष पर नहीं। ऐसी स्थिति में चिन्तकों, विचारकों तथा लेखकों ने अर्थशास्त्र के अध्ययन की ओर उदासीनता दिखाई। १८वीं शताब्दी के समय वणिकवादी विचारधारा का साम्राज्य बना रहा। उनका यह विश्वास था कि शक्तिशाली राज्य की स्थापना के लिए अधिक धन का होना अत्यावश्यक है। संसार में शक्तिशाली राज्य बनने के लिए राज्य को समृद्धशाली होना चाहिए। इस प्रकार की विचारधारा के प्रभाव के अधीन अर्थशास्त्र राज्य के लिये धन प्राप्ति का अध्ययन बन गया। हेनरिख ग्राटलीवान जस्ती ने कहा है- ‘‘राज्य का महान प्रबन्धन भी उन्हीं मौलिक सिद्धान्तों पर आधारित है जिन पर अन्य प्रबन्धन (गृह प्रबन्धन) आधारित है। दोनों संस्थाओं का उद्देश्य प्राप्त पदार्थों का उपयोग करने के लिए साधनों को प्राप्त करना है। यदि इन प्रबन्धनों में कोई अन्तर है, तो वह केवल यह है कि राज्य का गृह प्रवन्धन निजी व्यक्ति की प्रबंध की तुलना में अधिक महान् है। सर जेम्स स्टुवार्ट ने अपनी पुस्तक ‘एन इन्क्वायरी इन टु दि प्रिसिपिल्स आफ पालिटिक्स इकोनामी’ में अर्थशास्त्र विषयक सामग्री की व्याख्या करते हुए लिखा है- ‘‘सामान्यतया अर्थशास्त्र परिवार की सभी आवश्यकताओं की किफायत के साथ पूर्ति करने की कला है….. जो महत्व अर्थशास्त्र का परिवार के लिये है, वही महत्व राजनीतिक अर्थ-शास्त्र का राज्य के लिये है…।’’ एडम स्मिथ के समय अर्थशास्त्र धन का विज्ञान बन गया। स्मिथ महोदय की मान्यता है कि ‘‘अर्थशास्त्र राष्ट्रों के धन को प्रकृति तथा इसके कारणों का अनुसन्धान है।’’ जे बी के अनुसार अर्थशास्त्र उन विषयों का अध्ययन है, जिनके अनुसार धन प्राप्त किया जाता है। उन्होंने अपनी ‘‘ए ट्रिटाइज आन पोलिटिकल इकोनामी’’ नामक पुस्तक में लिखा है कि ‘‘राजनीतिक अर्थशास्त्र धन की प्रकृति की व्याख्या करता है तथा इसके नष्ट होने की घटना की विवेचना करता है।’’ जान शमसे मक्लुश के अनुसार राजनीतिक अर्थशास्त्र उन नियमों का विज्ञान है, जो ऐसी वस्तुओं के उत्पादन, संचय, वितरण तथा उपभोग का नियमन करते हैं, जो मनुष्यों के लिये आवश्यक तथा उपयोगी होती हैं और जिनका विनिमय मूल्य होता है। नासो विलियम सीनियर ने ‘एन आउट लाइन आफ दी सायन्स आफ पोलिटिकल इकानामी’ नामक पुस्तक में अर्थशास्त्र की परिभाषा के सम्बन्ध में इस प्रकार लिखा था- ‘‘राजनीतिक अर्थशास्त्री के अध्ययन का विषय. सुख नहीं है, बल्कि धन है। उसके आधार वाक्य उन कुछ थोड़े से सामान्य तर्क वाक्यों पर, जो स्वयं निरीक्षणों अथवा चेतना का परिणाम होते हैं तथा जिनको सिद्ध करने अथवा जिनका औपचारिक वर्णन करने की कोई आवश्यकता नहीं है, आधारित होते हैं। उसके आगमनात्मक अनुमान भी लगभग उतने ही सामान्य तथा अचूक होते हैं।’’ सीनियर ने अर्थशास्त्र के विषय क्षेत्र को बहुत सीमित करके इसे आमूर्त तथा निगमन विज्ञान बना दिया। जान स्टुअर्ट मिल ने अर्थशास्त्र की परिभाषा की व्याख्या करते हुए ‘एसेज आन अनसेटल्ड क्वेश्चन आन पोलिटकल इकानामी’ नामक पुस्तक में लिखा है कि ‘‘यह वह विज्ञान है जो उन सामाजिक घटनाओं को परिचालित करने वाले नियमों का अध्ययन करता है, जो मनुष्य जाति के धन का उत्पादन करने के सम्बन्ध में विद्यमान होती है तथा किसी अन्य लक्ष्य से प्रभावित नहीं होती।’’ बिट्रिश अर्थशास्त्रियों का यह दृढ़ विश्वास था कि समाज में वे सभी आर्थिक क्रियायें, जो व्यक्तिगत स्वार्थ की भावना से प्रेरित होती हैं, समाज के लिये भी हितकारी होती हैं। एडम स्मिथ के अनुसार धन सेवाओं और वस्तुओं का योग है। इस सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त करते हुए स्मिथ ने लिखा है -‘‘प्रत्येक व्यक्ति आवश्यकताओं, सुविधाओं तथा मनोरंजन की वस्तुओं के उपभोग की मात्रा के अनुसार धनी अथवा दरिद्र होता है। अधिक वस्तुओं का उपभोग करने वाला व्यक्ति धनी और कम वस्तुओं का उपभोग करने वाला व्यक्ति निर्धन होता है।’’ कारलाइल महोदय ने अर्थशास्त्र की कड़ी आलोचना की है और उसे ‘‘कुबेर की विद्या’’ कहा है। रस्किन का मत है कि मानव जाति के अधिकांश व्यक्तियों के मस्तिष्क में समय-समय पर, जो बहुत से भ्रम रहे हैं, उनमें से सम्भवतः सबसे अधिक अनोखा तथा सबसे कम विश्वसनीय राजनीतिक अर्थशास्त्र विज्ञान ही है। इसके अतिरिक्त मार्शल महोदय अर्थशास्त्र को मानव जीवन की दशाओं को सुधारने का साधन मानते हैं। उनके अनुसार ‘‘राजनीतिक अर्थशास्त्र अथवा अर्थशास्त्र जीवन के साधारण व्यवसाय में मानव जाति का अध्ययन है। यह व्यक्तिगत तथा सामाजिक क्रियाओं के उस भाग का परीक्षण करता है, जिसका विशेष सम्बन्ध जीवन में कल्याण अथवा सुख से सम्बद्ध भौतिक पदार्थों की प्राप्ति तथा उपभोग से है।’’ उपरोक्त अर्थशास्त्रियों की परिभाषाएँ अपने-अपने विभिन्न दृष्टिकोणों का प्रतिफल है। यदि इन परिभाषाओं के मूल रूप को देखा जाय तो ज्ञात होता है कि यह उसी धन से सम्बद्ध है जिसका भारत्तीय विचारकों ने अनेक रूपों...

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