सिन्धु सभ्यता में आर्थिक जीवन(Economic life in the Indus Valley Civilization)

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प्राचीन भारतवर्ष वर्तमान भारत से बहुत बड़ा था। उसकी सीमा में वर्तमान पाकिस्तान, भारत और बांग्लादेश सम्मिलित था। वैदिक साहित्य में देश के रूप में भारत का उल्लेख नहीं मिलता। इसका उल्लेख सर्वप्रथम पुराणों में मिलता है।

                उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमादे्रश्चैव दक्षिणम्।

                वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः।। (विष्णु पुराण)

इस नाम का सबसे पहला आभिलेखिक उल्लेख खारवेल के हाथीगुम्फा अभिलेख में मिलता है। यथा-

                दसमे च वसे दंड संधी सा (ममयो) भरदवस पठानं।

अशोक के अभिलेखों में इसे जम्बूद्वीप कहा गया है।

सिन्धु सभ्यता की भौगोलिक स्थिति एवं उन्नत आर्थिक अवस्थाओं के पीछे उन क्षेत्रों की तत्कालीन पारिस्थितिकी, उनका समुन्नत तकनीकी ज्ञान, शीघ्रगमन के लिए पहियों वाली गाड़ियों का प्रयोग और प्राकृतिक शथ्कत से पूर्ण संसाधनों के विकास ने महत्वपूर्ण योग प्रदान किया होगा। उत्खननों से प्राप्त पुरा सामग्रियों के तिथि निर्धारण के फलस्वरूप भारतीय सांस्कृतिक और आर्थिक इतिहास के विकास के अध्ययन को एक तैथिक आधार प्राप्त हुआ।

मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा की विशालता एवं इसकी समृद्धि इस बात को स्पष्ट करती है कि सिन्धु सभ्यता के लोगों की आर्थिक स्थिति संतोषजनक थी। सैंधव सभ्यता के समृद्ध आर्थिक जीवन में कृषि, पशुपालन, विभिन्न प्रकार के उद्योग-धंधों तथा व्यापार-वाणिज्य का प्रमुख योगदान था। कृषकों के अतिरिक्त उत्पादन और व्यापार-वाणिज्य के विकास के कारण ही इस नगरीय सभ्यता का विकास हुआ था।

कृषि पर आधारित अनाज उत्पादन की समुन्नत तकनीकों और विशेष शिल्पों का जब बहुत अधिक प्रयोग प्रारम्भ होता है तब किसान इतना अधिक अन्न उत्पन्न करने लगता है  िकवह उससे केवल अपना ही भरण-पोषण नहीं करता अपितु शासक, पुरोहित, सैनिक एवं शासक और वहाँ के निवासी और व्यापारी, शिल्पी भी उसके उत्पाद से ही अपनी-अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं।

कृषि –

प्राचीन भारत की भौगोलिक बनावट ही कृषि और कृषिपरक क्रियाकलापों के विकास और विस्तार के लिए इतनी अनुकूल थी कि यहाँ अत्यन्त प्रारम्भ में ही श्री गणेश न हो जाता तो कोई आश्चर्य की बात होती। आज की अपेक्षा सिंधु प्रदेश की भूमि पहले बहुत ऊपजाऊ थी। ई.पू. चैथी सदी में सिकंदर के एक इतिहासकार ने कहा था कि सिंधु की गणना इस देश के उपजाऊ क्षेत्रों में की जाती थी। पूर्व काल में प्राकृतिक वनस्पतियों बहुत अधिक थीं, जिसके कारण यहाँ अच्छी वर्षा होती थी। पकी ईंटों की सुरक्षा-प्राचीरों से संकेत मिलता है कि नदियों में बाढ़ प्रतिवर्ष आती थी। सिंधु तथा उसकी सहायक नदियों द्वारा प्रति वर्ष लायी गयी उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी इस क्षेत्र की उर्वरता को बहुत बढ़ा देती थी, जो कृषि के लिये महत्त्वपूर्ण थी। यहाँ के लोग बाढ़ के उतर जाने के बाद नवम्बर के महीने में बाढ़ वाले मैदानों में बुआई कर देते थे और अगली बाढ़ के आने से पहले अप्रैल के महीने में गेहूँ तथा जौ की फसल काट लेते थे।

सिंधु नदी घाटी के उपजाऊ मैदानों में मुख्यतः गेहूँ और जौ का उत्पादन किया जाता था। अभी तक नौ फसलों की पहचान की गयी है। गेहूँ बहुतायत में उगाया जाता था। जौ की दो और गेहूँ की तीन किस्में उपजाई जाती थीं। गेहूँ के बीज की दो किस्में स्परोकोकम तथा कम्पेस्टस उत्खनन में प्राप्त हुई हैं। बनावली में मिला जौ उन्नत किस्म का है। चावल की खेती केवल गुजरात (लोथल) और सम्भवतः राजस्थान में की जाती थी। लोथल से धान तथा बाजरे की खेती के अवशेष मिले हैं। इसके अलावा राई, खजूर, सरसों, तिल एवं कपास की भी खेती होती थी। सम्भवतः सबसे पहले कपास यहीं पैदा की गयी, इसीलिये यूनानी इस प्रदेश को ‘ सिंडन ’ कहते थे। यही नहीं, वे अनेक प्रकार के फल व सब्जियों भी उपजाते थे। हड़प्पाई पुरास्थलों के उत्खनन में पीपल, खजूर, नीम, नींबू, अनार एवं केला आदि के प्रमाण मिले हैं।

इस समय खेती के कार्यों में प्रस्तर एवं काँसे के बने औजार प्रयुक्त होते थे। यहाँ कोई फावड़ा या हल का फाल तो नहीं मिला है, किन्तु कालीबंगा की प्राक् हड़प्पा सभ्यता के स्तर से जो कूट (हलरेखा) मिले हैं, उनसे स्पष्ट है कि राजस्थान में इस काल में हलों द्वारा खेतो की जुताई की जाती थी। धातु के हल के अवशेष अभी तक नहीं मिले हैं परन्तु इसकी उच्च कोटि की जुताई में सन्देह नहीं किया जा सकता है। बणावली में मिट्टी का  बना हुआ हल-जैसा एक खिलौना मिला है। डी, डी, कौशाम्बी महोदय का मत है कि सैन्धव लोगों को भारी हल का ज्ञान नहीं था। इस मत को इस प्रकार खण्डित किया जा सकता है-प्रथम बहावलपुर एवं बणावली से मिट्टी के बने हल का मिलना। दूसरे यह मत ऐसे भी खारिज हो जाता है कि बिना हल के गहरी जुताई नहीं किया जा सकता। यदि यह न हो तो अधिशेष नहीं निकल पायेगा और न ही नगरीकरण ही हो पायेगा। जबकि हम सभी जानते हैं कि  सैन्धव सभ्यता नगरीय सभ्यता थी। मेहरगढ़ (पाकिस्तान) से कृषि – गेहूँ, जौ, अंगूर एवं कपास का प्रमाण मिला है। सम्भवतः सिंचाई के लिये नदियों के जल का प्रयोग किया जाता था। जलाशयों एवं कुओं से भी सिंचाई किया जाता रहा होगा। फसलों की कटाई के लिये सम्भवतः पत्थर या काँसे की हँसिया का प्रयोग किया जाता था। मेहरगढ़ से हँसिया का साक्ष्य मिला है। अनाज रखने की टोकरियों के भी साक्ष्य मिले हैं। अतिरिक्त उत्पादन को राज्य द्वारा नियन्त्रित भंडार गृहों (कोठारों या अन्नागारों) में रखा जाता था। मोहनजोदड़ो से प्राप्त विशाल अन्नागार इसका प्रमाण है। अनाज को चूहों से बचाने के लिये मिट्टी की चूहेदानियों का प्रयोग किया जाता था। अनाज कूटने के लिये ओखली और मूसल का प्रयोग होता था। लोथल से आटा पीसने की पत्थर की चक्की (जाँता) के दो पाट मिले हैं। लोथल और रंगपुर से मिट्टी के कुछ बर्तनों में धान की भूसी मिली है।

पशुपालन –

सैंधव सभ्यता में कृषि के साथ-साथ पशुपालन का भी महत्त्वपूर्ण स्थान था। पशु कृषि एवं यातायात के साधन थे।मृद्भांडों तथा मुहरों पर बने चित्रों एवं अस्थि-अवशेषों से लगता है कि मुख्य पालतू पशुओं में डीलदार एवं बिना डील वाले बैल, भैंस, गाय, भेड़-बकरी, कुत्ते, गधे, खच्चर और सुअर आदि थे। हड़प्पाई लोग सम्भवतः बाघ, हाथी तथा गैंडे से भी परिचित थे, किन्तु हाथी व घोड़ा पालने के साक्ष्य प्रमाणित नहीं हो सके हैं। हड़प्पा से गधे की हड्उी प्राप्त हुई है। एस. आर. राव को लोथल एवं रंगपुर से गाय एवं घोड़े के पुरातात्विक प्रमाण मिले हैं। सुरकोटदा से सैंधवकालीन घोड़े का अस्थिपंजर मिला है। गुजरात के शिकारपुर से प्राप्त पालतू पशुओं के साक्ष्य में भैंस, अश्व एवं कुत्ते प्रमुख थे। बन्दर, खरगोश, हिरन, मुर्गा, मोर, तोता, उल्लू जैसे कुछ पशु-पक्षियों के अवशेष खिलौनों और मूर्तियों के रूप में मिले हैं।

शिल्प एवं उद्योग-धंधे-

विभिन्न प्रकार के शिल्प एवं उद्योग-धंधे सिंधु सभ्यता के निवासियों के विकसित नागरिक जीवन के मूलाधार थे। इस समय मुद्रा एवं मूर्ति-निर्माण, वस्व-उद्योग, मृद्-भांड निर्माण, मनका उद्योग जैसे अनेक शिल्प और उद्योग पर्याप्त विकसित थे। सूत की कताई, बुनाई एवं कढ़ाई प्रचलित थी।

मुद्रा एवं मूर्ति-निर्माण –

हड़प्पा सभ्यता में मुहरों (मुद्राओं) का विशिष्ट स्थान था। अब तक विभिन्न स्थानों से लगभग 2,000 से अधिक मुहरें प्राप्त की जा चुकी हैं। इसमें लगभग 1,398 अकेले मोहनजोदड़ों से मिली हैं। मुहरों का निर्माण अधिकतर सेलखड़ी से हुआ है, परन्तु कुछ मुहरें काँचली मिट्टी, गोमेद, चर्ट और मिट्टी की बनी हुई भी प्राप्त हुई हैं। ये मुहरें आयताकार, वर्गाकार, गोल, घनाकार, वृत्ताकार एवं कुछ बेलनाकार भी हैं। मुहरों पर ठप्पे द्वारा विभिन्न चित्र उत्कीर्ण किये जाते थे। अधिकांश मुहरों पर संक्षिप्त लेख, एकश्रृंगी साँड, भैस, बाघ, गैंडा, हिरन, बकरी एवं हाथी के चित्र उकेरे गये हैं। इनमें से सर्वाधिक आकृतियाँ एकश्रृंगी साँड़ की हैं। लोथल और देसलपुर से ताँबे की मुहरे मिली है। मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, लोथल, कालीबंगा आदि स्थानों से पत्थर, धातु और पकी मिट्टी की स्त्रियों, पुरुषों एवं पशु-पक्षियों की तमाम मूर्तियाँ मिली है, जिससे पता चलता है कि इस सभ्यता में बड़े पैमाने पर मूर्तियों का निर्माण भी होता था।

वस्त्र उद्योग-

सैंधव क्षेत्र में कपास की खेती बड़े पैमाने पर की जाती थी जिससे वस्त्र उद्योग को प्रोत्साहन मिला। यहाँ सुती एवं ऊनी दोनों प्रकार के वस्व तैयार किये जाते थे। आलमगीरपुर से प्राप्त मिट्टी की एक नादपर बुने हुए वस्त्र के निशान मिले हैं। मोहनजोदड़ो से मजीठा से लाल रंग में रंगे हुए कपड़े के अवशेष चाँदी के बर्तन में पाये गये थे। ताँबे के दो उपकरणों में लिपटा हुआ सुती कपड़ा एवं सुती धागा भी मोहनजोदड़ो से मिला है। मोहनजोदड़ो, लोथल, रंगपुर एवं कालीबंगा से सती कपडे की छाप मिली है। मोहनजोदा से प्राप्त पुरोहित की प्रस्तर मूर्ति तिपतिया अलंकरणयुक्त शाल ओढ़े हुए है। इससे लगता है कि इस समय वस्त्र एवं कताई-बनाई उद्योग विकसित अवस्था में था। कताई-बनाई में प्रयुक्त होने वाली तकलियों एवं चरखियों के भी प्रमाण मिले हैं।

धातु उद्योग-

यद्यपि सैंधव सभ्यता के लोग पत्थरों के औजारों एवं उपकरणों का प्रयोग करते थे, किन्तु वे धातुकर्म से भी भली-भाँति परिचित थे। वे धातु को गलाना, ढालना तथा साँचे के द्वारा निर्माण करना जानते थे। टिन और ताँबा के मिश्रण से काँसे को तैयार किया जाता था। उन्हें ताँबा राजस्थान के खेतड़ी की खानों से और टिन अफगानिस्तान से मिल जाता था, क्योंकि इन दोनों में से कोई भी खनिज यहाँ पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं था। सम्भवतः कसेरों (कॉस्य-शिल्पियों) का समाज में महत्त्वपूर्ण स्थान था। खुदाई में ताँबे व काँसे के उपकरण अधिक मात्रा में मिले हैं। इनमें काँसे की बनी सुराही, कटोरा, तवा, लम्बी एवं छोटी कुल्हाड़ियाँ, आरा, मछली पकड़ने का काँटा और ताँबे की बनी तलवारें व छूरे प्रमुख हैं।

कसेरों के अतिरिक्त हड़प्पाई समाज में राजगीरों एवं आभूषण-निर्माताओं का समुदाय भी सक्रिय था। आभूषणों के लिये सोना-चाँदी सम्भवतः अफगानिस्तान से एवं रत्न दक्षिण भारत से मगाया जाता था। लोथल से प्राप्त एक कंठहार, जो अनेक स्वर्ण मनकों से बना है, कारीगरी का अनूठा नमूना है। धातु की बनी कुछ मूर्तियाँ भी मिली हैं, जिनमें मोहनजोदड़ो से प्राप्त काँसे की नर्तकी की मूर्ति सर्वाधिक प्रसिद्ध है। लोथल से प्राप्त ताँबे का कुत्ता कला की दृष्टि से बेजोड़ है। इसके अलावा हड़प्पा से मिली ताँबे की इक्कागाड़ी तथा चांहूदड़ो से मिली ताँबे की दो गाड़ियों की अनुकृतियाँ भी महत्त्वपूर्ण हैं। हड़प्पाई लोग सीसा से भी परिचित थे।

मृद्भांड उद्योग –

हड़प्पा सभ्यता में कुम्हारी कला भी पर्याप्त विकसित थी। इस सभ्यता के कुम्हार भवनों के लिये ईंट तो बनाते ही थे, मिट्टी के बर्तन, खिलौनों और आभूषणों का भी निर्माण करते थे। इस समय चाक से निर्मित मृद्भांड काफी प्रचलित थे, यद्यपि हस्तनिर्मित मृद्भांड भी पाये गये हैं। हड़प्पाई बर्तनों में घड़े, प्याले, सुराहियों और नाँद प्रमुख थे, जो विधिवत् पके हुए हैं और चित्रकारीयुक्त हैं। मिट्टी की बनी कुछ खानेदार थालियों और चूहेदानियों भी खुदाई में मिली हैं। पशु-पक्षियों की आकृति वाले मिट्टी के खिलौने, खिलौना गाड़ियों एवं मिट्टी की बनी मूर्तियाँ भी बड़ी संख्या में पायी गयी हैं।

मनका उद्योग- 

काँस्ययुगीन सभ्यता होने के बावजूद हड़प्पाई शिल्पी पत्थर एवं धातु के मनके, मूर्तियाँ, आभूषण आदि बनाते थे। चांहूदड़ो तथा लोथल में मनका बनाने का कारखाना प्रकाश में आया है। सेलखड़ी, सीप, हाथीदाँत, घोंघा एवं मिट्टी आदि से बने मनकों का उपयोग खिलौनों और आभूषणों के रूप में होता था। इस सभ्यता के स्थलों से पत्थर के बाट-बटखरे बड़ी संख्या में मिले हैं। चांहूदड़ों में सेलखड़ी की मुहर और चर्ट के बाट भी बनाये जाते थे। बालाकोट तथा लोथल में सीप उद्योग विकसित अवस्था में था। हाथीदाँत से भी अनेक उपकरण और प्रसाधन सामग्री का निर्माण किया जाता था। मोहनजोदड़ों की मुहर पर नाव के चित्र तथा लोथल से प्राप्त गोदीवाड़ा से लगता है कि यहाँ नाव और जलयान निर्माण भी प्रमुख उद्योग था। इसके अलावा चिकित्सकों, राजगीरों एवं मछुआरों का व्यवसाय भी विकसित अवस्था में था।

उद्योगधंधों एवं शिल्पकार्यों के लिये कच्चा माल गुजरात, सिंधु, राजस्थान, दक्षिणी भारत, बलूचिस्तान आदि क्षेत्रों से मगाया जाता था। इसके अतिरिक्त अफगानिस्तान, सोवियत, तुर्कमानिया तथा मेसोपोटामिया (सुमेर) आदि से भी कच्चा माल आयात किया जाता था। मनके बनाने के लिये गोमेद गुजरात से आता था। प्लिण्ट तथा चर्ट के प्रस्तर-खंड पाकिस्तान के सिंधु क्षेत्र में स्थित रोड़ी तथा सुक्कुर की खदानों से आते थे। ताँबा राजस्थान के झुंझनूं जिले में स्थित खेतड़ी (खेत्री) की खानों से मंगाया जाता था। सोना सम्भवतः कर्नाटक के कोलार की खानों से मिलता था।

व्यापार एवं वाणिज्य-

सैंधव सभ्यता की आर्थिक समृद्धि का एक प्रमुख आधार विकसित व्यापार-वाणिज्य था। उनका आंतरिक एवं बाह्य व्यापार पर्याप्त उन्नत था। व्यापारिक गतिविधियों से सम्बन्धित नगर मुख्यतः दो प्रकार के थे- मोहनजोदड़ो, चांहूदड़ो, हड़प्पा, कोटदीजी जैसे नगर उत्पादन से जुड़े हुए थे, जबकि लोथल, धौलावीरा, सुरकोटदा और बालासोर- जैसे नगर विपणन से सम्बद्ध थे। हड़प्पाई लोग सिंधु सभ्यता के क्षेत्र के भीतर पत्थर, धातु, सिल्क आदि का व्यापार करते थे, लेकिन वे जो वस्तुएँ बनाते थे, उसके लिये अपेक्षित कच्चा माल उनके नगरों में उपलब्ध नहीं था। इसलिये उन्हें बाह्य देशों से व्यापारिक सम्पर्क स्थापित करना पड़ता था। उन्होंने उत्तरी अफगानिस्तान में एक वाणिज्यिक उपनिवेश स्थापित किया, जिससे उन्हें व्यापारिक गतिविधियों में सहायता मिलती थी। तैयार माल को खपाने की आवश्यकता ने व्यापारिक सम्बन्धों को प्रगाढ़ बनाया।

इस सभ्यता के लोगों का मेसोपोटामिया, मिश्र बहरीन, क्रीट आदि देशों से घनिष्ठ व्यापारिक सम्बन्ध था। मेसोपोटामिया में प्रवेश के लिये ‘उर’ एक महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह था। मेसोपोटामिया के अभिलेखों में ‘मेलुहा’ के साथ व्यापार के प्रमाण मिले है. साथ ही दो मध्यवर्ती व्यापार केंद्रों- ‘दिल्मुन’ और ‘मकन’ का भी उल्लेख मिलता है। मेलुहा सिंध क्षेत्र का ही प्राचीन नाम है। यहाँ से उर के व्यापारी सोना, चाँदी, लाल पत्थर, लाजवर्द मणि, हाथीदाँत की वस्तुएँ, खजूर, विविध प्रकार की लकड़ियाँ, खासकर काली लकडी (आबनूस), मोर पक्षी आदि प्राप्त करते थे। दिल्मुन की पहचान फारस की खाड़ी के बहरीन द्वीप से और मकन (मगन) की पहचान बलुचिस्तान के मकरान तट से किया गया है। गुजरात के लोथल से फारस की मुहरें प्राप्त हई हैं, जिससे लगता है कि लोथल बन्दरगाह से समुद्री मार्ग द्वारा विभिन्न देशों के साथ व्यापार होता था। गोरिल्ला और ममी की आकृति से मिलते-जुलते कुछ पुरातात्विक प्रमाण एस.आर. राव को महोदय को प्राप्त हुए हैं, जो मिस्र के साथ व्यापारिक सम्बन्धों के द्योतक माने जा सकते हैं। इसी प्रकार क्रीट से प्राप्त मुद्राओं पर मातृदेवी, सिंह-मानव-युद्ध आदि के चित्रांकन से व्यापारिक सम्बन्धों का अनुमान किया जा सकता है।

आयात-निर्यात की वस्तुएँ –

सैंधव सभ्यता के लोगों का व्यापारिक सम्बन्ध राजस्थान, अफगानिस्तान, ईरान एवं मध्य एशिया के साथ था। लाजवर्द एवं चाँदी अफगानिस्तान से आयात की जाती थी। ईरान से फिरोजा, टिन एवं चाँदी आयात की जाती थी। सोना दक्षिण भारत (मैसूर) से, ताँबा राजस्थान, बलूचिस्तान तथा अरब देश से, टिन अफगानिस्तान, ईरान तथा राजस्थान से, बहुमूल्य पत्थर, जैसे लाजवर्द, गोमेद, पन्ना, मूँगा इत्यादि अफगानिस्तान, ईरान, महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, राजस्थान और कश्मीर से मंगाते थे।

सिंधु से मेसोपोटामिया को निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में सूती वस्त्र, इमारती लकड़ी, मसाले, हाथीदांत, ताँबा, सोना, चाँदी एवं पशु-पक्षी रहे होंगे। उर के उत्खनन में हड़प्पा निर्मित ताँबे का श्रृंगारदान मिला है। मेसोपोटामिया से हड़प्पाई मनके, धातुएं, औषधियों एवं विलासिता की वस्तुएँ मंगाते थे। अभिलेखीय साक्ष्यों से पता चलता है कि दिल्मुन (बहरीन) से सोना, चाँदी, लाजवर्द, माणिक्य के मनके, हाथीदाँत की कंघी, पशु-पक्षी, आभूषण आदि आयात किया जाता था। सुमेर, उर, किश, लगश, निप्पुर, टेल अस्मर, टेपे, गावरा, उम्मा, असुर आदि मेसोपोटामियाई नगरों से हड़प्पा सभ्यता की लगभग एक दर्जन मुहरें मिली हैं। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि मेसोपोटामिया में सैंधव व्यापारियों की कोई बस्ती अवश्य रही होगी।

इस सभ्यता के लोग व्यापार में धातु के सिक्कों का प्रयोग नहीं करते थे, बल्कि उनका व्यापार वस्तु विनिमय प्रणाली पर ही आधारित था। व्यापारिक वस्तुओं की गाँठों पर शिल्पियों एवं व्यापारियों द्वारा एक ओर अपनी मुहर (मुद्रा) की छाप डाली जाती थी और दूसरी ओर भेजे जाने वाली वस्तु का निशान अंकित किया जाता था। व्यापार मुख्यतः

जलीय मार्गों से होता था, किन्तु थल मार्ग का भी उपयोग किया जाता था। इस सभ्यता के लोग पहिये से परिचित थे और यातायात के रूप में दो पहियों एवं चार पहियों वाली बैलगाड़ी अथवा भैंसागाड़ी का उपयोग करते थे। उनकी बैलगाड़ी में प्रयुक्त पहिये ठोस आकार के होते थे। मोहनजोदड़ो की एक मुहर पर नाव का चित्र तथा लोथल से मिट्टी का नाव जैसा खिलौना मिला है, जिससे लगता है कि इस सभ्यता के लोग आंतरिक एवं बाह्य व्यापार में मस्तूलवाली नावों का उपयोग करते थे।

व्यापार में नाप-तौल के लिये बाट-माप का प्रयोग किया जाता था। उत्खनन में नाप-तौल से सम्बन्धित विभिन्न प्रकार के अवशेष प्राप्त हए हैं. जिससे स्पष्ट होता है कि इस सभ्यता में व्यापार के लिये भार विभिन्न प्रकार के बाटों का प्रयोग किया जाता था। यह बाट पत्थर के बने होते थे तथा इन्हें एक निश्चित आकार में बनाया गया था। सबसे छोटा बाट 13.64 ग्राम का था। मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, लोथल एवं कालीबंगा से बाट-जैसी वस्तुएँ बड़ी संख्या में प्राप्त हुई हैं। बाट घनाकार, वर्तुलाकार, बेलनाकार, शंक्वाकार एवं ढोलाकार होते थे, जो पहले दुगुने क्रम (द्विचर प्रणाली) में हैं, किन्तु बाद में 16 के गुणन में, जैसे- 1, 2, 4, 8, 16, 32, 64, 160, 320, 1600 तथा 3200 इकाइयों के बाट प्राप्त हुए हैं। इस प्रकार माप-तौल में 16 या उसके आवर्तकों का प्रयोग होता था। अभी कुछ समय पहले तक भारत में एक रुपया 16 आने का होता था। सबसे बड़ी तौल 10790 ग्राम की और सबसे छोटी तौल 8565 ग्राम की है। मोहनजोदड़ो से सीप तथा लोथल से हाथीदाँत का एक-एक पैमाना भी प्राप्त हुआ है।

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Dr vishwanath verma

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