इतिहास का कोई धर्म नहीं होता, वह निरपेक्ष होता है। इसलिए इतिहास को निपरेक्ष होना चाहिए, यदि वह निरपेक्ष नहीं तो वह इतिहास नहीं है। प्राचीन भारतीय इतिहास के साथ भी यही बात रही। विज्ञान के इस युग में सामाजिक ज्ञान प्राचीन ज्ञान की अपेक्षा अग्रेतर है। नव.पुरातन मान्यताओं और तर्काें की कसौटी पर रखते हुए नये.नये परिणाम खोजे जा रहे हैं और नये.नये विचारों को स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है। सरस्वती नदी, उसके प्रवाहित मार्ग, उसके तटों पर पनपी और विकसित हुई और पुनः उजड़कर विलुप्त हुई सभ्यता एवं संस्कृति और उसकी प्रथा-परम्परा, इतिहास, भूगोल, समाज, मानव- जाति, रहन.सहन, व्यवसाय, वेशभूषा, आस्था-विश्वास, धार्मिक जीवन, मृद्भाण्ड आदि के विषय में निरन्तर खोज करने और अधिकाधिक ज्ञान प्राप्त करने के लिये विद्वत समाज वर्षों से अनवरत प्रयास कर रहा हसंस्कृति मानव समाज की अमूल्य निधि होती है। मानव इसलिये मानव है कि उसके पास संस्कृति है। संस्कृति के अभाव में मानव मानव नहीं, पशु के समान होता है। मनुष्य में कुछ ऐसी शारीरिक क्षमताएँ विद्यमान होती हैं, जिसके कारण वह संस्कृति का निर्माता होता है। मानव ही संसार में एक ऐसा प्राणी है, जो अपनी क्षमताओं और विशेषताओं के कारण सभ्यता और संस्कृति का निर्माण कर पाया।
प्राचीन विश्व की अनेक सभ्यताएँ एवं संस्कृतियाँ प्रायः नदियों के किनारे ही विकसित हुई। उनकी कृषि, पशुपालन, नगर-नियोजन, धार्मिक जीवन, साहित्य, कला आदि का विकास सब कुछ नदी घाटी के किनारों पर ही पल्लवित एवं पुष्पित हुए। प्राचीन भारत में तो सभी प्रारम्भिक और छोट-.बड़े साहित्यिक ग्रन्थों जैसे वेद, उपनिषद्, ब्राह्मण, आरण्यक, दर्शन आदि में से अधिकांश की रचना सरस्वती नदी घाटी में ही लिखे गये। जिसके कारण ही सरस्वती विद्या की देवी कहलायी। कृषि की अधिष्ठात्री देवी सीता, इसी सरस्वती का ही एक रूप है। इसी तरह पलक्षा नदी का दैवीय रूप लक्ष्मी है। ऋग्वेद के साक्ष्यों से भी ऐसा प्रतीत होता है कि सरस्वती का ही वर्तमान स्वरूप लक्ष्मी में विद्यमान है।
एशिया की सभ्यताएँ विश्व की प्राचीन सभ्यताएँ हैं। यहाँ की प्राचीन सभ्यताएँ किसी.न.किसी नदी के किनारे ही विकसित हुई। मिस्र की सभ्यता नील नदी के किनारे, भारत की सबसे पुरानी सभ्यता सिन्धु एवं सरस्वती नदी घाटी में तथा निकट पूर्व की सबसे प्राचीन सभ्यता दजला और फरात नदियों के किनारे पर ही विकसित हुई। इसी प्रकार चीन की सभ्यता ह्वांगहों और यांग-टी-सी-क्यांग के किनारे विकसित हुई। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि एशिया की सभी सभ्यताएँ, जो कि विश्व की प्राचीन सभ्यताएँ हैं, नदी घाटी के किनारे पर ही विकसित हुईं। ऋग्वेद में सरस्वती नदी का उल्लेख उत्तर पश्चिमी भारत में एक महान् और पवित्र नदी के रूप में मिलता है। 20वीं शताब्दी ईसवी के प्रारम्भ में पुरातत्त्ववेत्ताओं और भू.वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन के उपरान्त यह सिद्ध करने का प्रयास किया और बताया कि ऋग्वेद में वर्णित सरस्वती नदी का समीकरण घग्घर (घग्गर) हाकरा नदी से किया जा सकता है। क्रिश्चियन लासेन, मैक्समूलर, आरेल स्टाइन, सी.एफ. ओल्डन और जेन मंैकिटोस आदि विद्वानों ने सरस्वती नदी का समीकरण घग्गर-हाकरा नदी से करते हैं। डेनिनों का मत है कि ‘घग्गर-हाकरा का विस्तार सरस्वती का अवशेष था।’ फिलिप, विरदी और वी. के. एस. वाल्डिया महोदय ने सरस्वती का समीकरण घग्गर से स्थापित करने का प्रयास किया है। ग्रेगरी पोसेहल नामक विद्वान् का मत है कि ‘भाषाई’, पुरातात्त्विक और ऐतिहासिकता के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि वैदिक साहित्य में वर्णित सरस्वती नदी का समीकरण वर्तमान घग्गर या हाकरा से स्थापित किया जा सकता है।
सरस्वती घाटी सभ्यता एवं संस्कृति को विश्व पटल पर लाने के लिए भारत सरकार के द्वारा पूर्व में श्री जगमोहन (पूर्व केन्द्रीय मंत्री) ने एक चार सदस्यों वाली विशेषज्ञ समिति का गठन किया था। इस विशेषज्ञ समिति में स्पेश एप्लीकेशन सेन्टर के पूर्व डिप्टी डायरेक्टर श्री बलदेव सहाय, श्री वी. एम. पुरी, ज्योलाजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया, लखनऊ, डॉ. एस.कल्याणरत्नम, एशियन डेवलेपमेंट बैंक के पूर्व सीनियर एक्जीक्यूटिव श्री माधव चितलें, पूर्व सेक्रेटरी, ग्राउण्ड वाटर मैनेजमेण्ट की अध्यक्षता में आदिबद्र्री से भगवानपुर, सिरसा होते हुए कालीबंगन तक पुरातात्विक उत्खनन एवं अन्य सम्बन्धित कार्यों को करने की योजना बनायी गयी। यह सम्पूर्ण कार्य योजना को दो चरणों में सम्पादित किया गया। यद्यपि भारतीय इतिहास संकलन समिति के तत्त्वाधान में 1993 ई. में विलुप्त या सूखी हुई सरस्वती नदी को ढूढ़ने खोजने का कार्य प्रारम्भ किया गया था। तब से लेकर आज तक निरन्तर विद्वानों, इतिहासकारों, पुरातत्त्वेत्ताओं, भू.वैज्ञानिकों, लेखकों आदि द्वारा सरस्वती नदी से सम्बन्धित साक्ष्यों, स्थानों आदि को खोजने-लिखने के लिये कार्य किया जा रहा है। इस कार्य में श्री सी. एन. ओल्डहेन, श्री आरेल स्टाइन, डॉ0 बी.बी. लाल, श्री आर. एसण्. विष्ट, श्री के. जी. गोस्वामी, श्री रविप्रकाश आर्य, डॉ0 अशोक साहनी, श्री ओ. पी. भारद्वाज, श्री के. एफ. दलाल, श्री बी. घोष, श्री जे. एस. खत्री, श्री एम. आचार्य, श्री भगवान सिंह, श्री देवेन्द्र स्वरूप, श्री आर. सी. ठाकरान, श्री जगपति जोशी, श्री आर. एस. शर्मा, श्री के. सी.् यादव आदि अनेक विद्वानों, पुरातत्त्वविदों, वैज्ञानिकों, लेखकों आदि का योगदान सरस्वती नदी को बूढ़ने में सराहनीय रहा। जिससे भारतीय इतिहास को एक नया आयाम मिला।
साहित्य में सरस्वती-
ऋग्वैदिक संस्कृति का मूल केन्द्र पंजाब से पूरब की ओर सरस्वती और दृषद्वती नदियों के मध्य भाग तक सीमित था। मनु महोदय ने इसे ब्रह्मावर्त कहा है। यथा-
सरस्वतीदृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम् । तं देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावर्त प्रचक्षते।।
ऋग्वेद में लगभग 40 नदियों के नाम का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद के नदी सूक्त में 21 नदियों का विवरण मिलता है। पहली गंगा और अन्तिम गोमल (गोमती) है। ऋग्वैदिक सभ्यता एवं संस्कृति का विस्तार कुरुक्षेत्र तक था। आर्यों के राज्य की सीमा का विस्तार कुरु-पांचाल तक हो गया था। सात प्रमुख नदी में से एक नदी सरस्वती है। यह नदी पुण्य सलिला है। कोई भी पूजा आदि करने के पहले इस नदी का आहवाहन करना आवश्यक होता है। यथा-
गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन सन्निधिं कुरु।।
ऐसी मान्यता है कि पूजा के लिये प्रयुक्त होने वाले जल में उक्त 7 पुण्यसलिला नदियाँ अवस्थित है। ऋग्वेद के मंत्रों में सरस्वती नदी की दिव्य महिमा का वर्णन मिलता है। इस नदी के साथ अनेक ऐतिहासिक, धार्मिक तथा आध्यात्मिक घटनाएँ जुड़ी हैं।
ऋग्वेद के मंत्र 10/64/8-9 में 21 नदियों की चर्चा मिलती है। जिसमें सरस्वती, सरयू और सिन्धु का दैवी नदी तथा माता के रूप में उल्लेख मिलता है। सरस्वती की दैवी (असूर्या) उत्पत्ति की चर्चा ऋग्वेद में मिलती है। (ऋग्वेद, 7/96/1) सम्भवतः ऐसा माना जाता है कि वैदिक जनों की प्रारम्भिक बस्तियाँ सरस्वती नदी के किनारे पर ही आवासित हुई। जो कालान्तर में भारत के अन्य भू-भागों में फैली। सरस्वती नदी के भू-भाग में ही वेदों की रचना हुई, इसलिए यह नदी प्रियजनों के लिये अत्यधिक महत्त्वपूर्ण थी। ऋग्वेद में इसे नदीतमा अर्थात् नदियों की माता कहा गया है। (ऋग्वेद, 2.41.16) ऐसी मान्यता है कि पुराणों का संकलन सरस्वती नदी के तट पर ही हुआ था। महाभारत में भी इसे प्रधान और सागरगामिनी कहा गया है। यथा-
एषा सरस्वती पुण्या नदीनामुत्तमा नदी। प्रथमा सर्वसरितां नदी सागरगामिनी।।
ऋग्वेद में सरस्वती नदी के विषय में कहा गया है कि वह नदियों तथा देवियों में श्रेष्ठ है। ‘‘अम्बितमे नदीतमे देवितमे सरस्वति।’’ (ऋग्वेद, 2/14/6)। ऋग्वेद में सरस्वती नदी की काफी प्रशंसा मिलती है। सरस्वती नदी के विषय में वर्णन मिलता है कि केवल सरस्वती ही ऐसी नदी है जो पर्वतों से बहती हुई समुद्र की ओर जाती है। (ऋग्वेद, 7/92/2)। इसी प्रकार ऋग्वेद में प्रचण्ड एवं गर्जनयुक्त सरस्वती की बाढ़ों तथा शक्तिशाली उत्ताल तरंगों से पहाड़ियों की शिला तोड़ते हुए प्रवाहित होने का उल्लेख मिलता है। यथा-
इयं शुष्मेभिर्विसरवा इवारूजत्सानु गिरीणां ताविषेभिरूर्मिभिः……..यस्या अनन्तो अहनु-तस्त्वेश्रच्रिष्णुरर्णवः। अमश्चरित रोरुवत। (ऋग्वेद, 6/61/2-9)
सरस्वती नदी के तट पर यज्ञों के सम्पादन का वर्णन भी ऋग्वेद में मिलता है। अतः सम्भव है कि सरस्वती के तटों पर भरत जनों के उपासना स्थान रहे हों। इसमें सन्देह नहीं है कि काव्य और कवियों से घनिष्ठ सम्बन्ध के कारण ही ऋग्वेद में वर्णित सभी नदियों में केवल सरस्वती वाणी की देवी बनी। पंजाब के भू-क्षेत्र पर सरस्वती नदी क्षेत्र पी. डब्ल्यू. जी सभ्यता के भरत जन थे तो गंगा-यमुना क्षेत्र में अज जन थे। एक ओर अग्नि का प्रयोग, कृषि का ज्ञान और बेहतर अस्त्र-शस्त्र वाले, निपुण, आक्रामक, भाषा व लिपि के ज्ञाता सभ्य जन थे तो दूसरी ओर अर्द्धसभ्य आदिम जीवन यापन करने वाले वनों पर आश्रित, सामना होने की स्थिति से बचने वाले अज जन।
भरत जन के विषय में पुसाल्कर महोदय कहते हैं कि, ‘‘भरतों ने पूरे देश को अपना नाम दिया, ऋग्वैदिक गणों में वे सबसे महत्त्वपूर्ण थे।’’ किन्तु ऋग्वेदोत्तर काल में भरतों का एक गण के रूप में लोप हो जाता है। जो प्राचीन भारतीय इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना मानी जा सकती है। अनेक विद्वान यह स्वीकार करते हैं कि ऋग्वेद के बाद वैदिक संस्कृति का केन्द्र अपने स्थान से हटकर पूर्व की ओर आ गया। भरतों का गण रूप में लोप और वैदिक संस्कृति के केन्द्र का स्थान परिवर्तन दोनों स्पष्ट ही परस्पर सम्बद्ध घटनाएँ हैं। पुसाल्कर महोदय के अनुसार ‘इस काल के ग्रन्थों में उनके राजाओं की ख्याति का लोप नहीं हुआ।’ यह ख्याति परम्परा पूर्ववत् चली आ रही थी। भरतों के सम्मान में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं आयी। यदि गण रूप में उनका अस्तित्व बना रहता तो मध्यदेश में वैदिक संस्कृति का नया केन्द्र स्थापित ही न होता। संस्कृत भाषा का विकास मध्यदेश में हुआ, जहाँ उच्च एवं शिक्षित वर्गों की बोलचाल की भाषा उसका आधार बनी और ऋग्वेद की पवित्र भाषा से वह प्रभावित हुई।
सरस्वती भू-क्षेत्र के सभ्य लोग यज्ञ करते थे। यज्ञ के नाम पर ये लोग नदी के तटवर्ती जंगलों में आग लगा देते थे। ऐसा इसलिये करते थे कि जनसंख्या वृद्धि के कारण नये नगर की स्थापना और खेती के लिये उर्वर भूमि के लिये नदी का तटवर्ती मैदान आदि के लिये आवश्यक था।
देश भेद के आधार पर सरस्वती नदी के सात पर्याय मिलते हैं- ‘पुष्कर में पितामह के यज्ञ में यह नदी आहुत होकर सुप्रभा नाम से, इसी प्रकार नैमिषारण्य में सत्याजी ऋषियों द्वारा आहुत होकर कांचनाक्षी, गय देश में गयराज, यज्ञ में आहुत होकर विशाला, उत्तरकोशल में औद्दालक मुनियज्ञ में मनोरमा, कुरुक्षेत्र में कुरुराजयज्ञ में ओधवती, गंगाद्वार में दक्ष प्रजापति के यज्ञ में सुरेणु और हिमालय पर्वत पर ब्रह्मा के यज्ञ में आहुत होकर विमलोदा, युक्त सात स्थानों में सरस्वती सात नामों से विख्यात हुई हैं।
सरत्सीता, सरस्वती, सीता, शैलोदा, पलक्षा एक ही नदी के क्षेत्रीय नाम लगते हैं। पलक्षा नाम से ही धन वैभव सम्पन्नता की देवी लक्ष्मी के नाम की उत्पत्ति हुई। सीता वैदिक युग में कृषि की अधिष्ठाती देवी मानी गयी हैं। सीता को लक्ष्मी का अवतार माना जाता है। इसका कारण यह है कि सीता और पलक्षा एक ही नदी थी।
दृषद्वती नदी –
भारत देश की प्राणदायिनी शक्ति नदियाँ है। इस देश की जनता के लिये वे ही सब कुछ हैं। आर्यों ने इस देश को अपने स्थायी निवास के लिये सम्भवतः इसलिये चुना कि यहाँ समुद्रों, नदी और विशाल झीलों की प्रमुखता थी। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि आर्यों को नदी तट की भूमि अत्यन्त दिय थी। दृषद्वती नदी का उल्लेख सरस्वती नदी के साथ ही ऋग्वेद में मिलता है। ऋग्वेद में दृषद्वती आपया तथा सरस्वती के साथ अग्निपूजा के लिये पवित्र कहा गया है। इसका उद्गम स्थल हिमालय पर्वत माना गया है। लाट्यायन श्रौतसूत्र में वर्णन मिलता है कि यह नदी वर्षा पर आधारित नदी थी। इसीलिये वर्षाकाल में जलमग्न तथा अन्य समय में शुष्क रहती थी। महाभारत के वनपर्व तथा मनुस्मृति में इसे देवनदी के नाम से जाना जाता था। मनुस्मृति में कहा गया है कि सरस्वती और दृषद्वती नदी के मध्य का भू-भाग ब्रह्मावर्त् था, जो एक पवित्र क्षेत्र था।
वर्तमान खोजों के अनुसार यह नदी सरस्वती की सहायक नदी थी। कुछ विद्वानों के अनुसार यह वर्तमान घग्गर या चितांग नदी है। कनिंघम महोदय ने इसे थानेश्वर के 17 मील दक्षिण स्थित राक्शी नदी माना है।
शूरसेन के मधु (मैदा) क्षेत्र से पलायन कर श्रीकृष्ण ने जगाधारी के स्थान पर द्वारिका की स्थापना किया होगा। सरस्वती-यमुना द्वारा निमित्त सागर के समीप, जहाँ सरस्वती नदी पश्चिम वाहिनी थी, का भू-भाग प्रभाष कहलाता था। श्रीकृष्ण का नाम जगन्नाथ इसी जग, जुग, जुगन्धार या युगन्धर दृषद्वती नाम पर पड़ा। द्वारिका के मूल में दृषद्धती, द्वारःवती या दारावती शब्द है। वैसे भी जगधारी का प्रदेश प्राचीन काल में कान्यकुब्ज का द्वार कहलाता था।
सरस्वती एक महापुण्य तीर्थ है। महाभारत में लिखा है, सभी नदियों में सरस्वती अति पवित्र और सब लोकों को शुभ देने वाली है। इस नदी में स्नान करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। सरस्वती नदी के किनारे निवास करने से जैसा गुण प्राप्त होता है, वैसा और कहीं भी नहीं होता। कितने ही लोगों ने सरस्वती का आश्रय लेकर स्वर्गारोहण कर गये हैं, उसकी शुमार नहीं। अतएव सरस्वती नदी पुण्य नदियों में प्रधान है।
ब्रह्मवैवर्तपुराण में लिखा है कि यह नदी अति पुण्यतमा है। यदि कोई इस नदी में स्नान करता है तो उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं तथा वह बैकुण्ठ में विष्णुलोक में वास करता है। चातुर्मास्य, पूर्णिमा, अक्षया, अमावस्या आदि शुभ तिथियों में जो सरस्वती के जल में अवगाहन करता है, वह सभी पापों से विमुक्त होकर मुक्ति लाभ करता है। जिस प्रकार अग्नि में सभी वस्तु दग्ध हो जाती है, उसी प्रकार इस सरस्वती नदी में सभी पाप तत्क्षण् भस्मीभूत होते हैं।
सरस्वती नदी आर्य जाति की जीवन रक्षा (खाद्यान्न) की एकमात्र स्रोत थी। ऐसा प्रतीत होता है कि इसी कारण आर्य लोग बहुत दिनों तक इस नदी के तटवर्ती भू-भागों में अवस्थित रहे। सरस्वती शक्तिसम्पत्र नदी मानी जाती है, इसके साथ ही मानवों के लिये जीवनयापन हेतु आवश्यक सामग्री एकत्र करने में सहायता करती है। उसने मनुष्यों को भूमि प्रदान की, उनके लिये जल प्रवाहित किया है, वह अन्नवती (वाजिनीवती) है। ऋग्वेद में उसे वाजेषुवाजिनी कहा गया है, जो सरस्वती से धरती की उवर्रता की बात करता है। यहाँ वाजेषु का अर्थ युद्ध से नहीं है, इसका प्रमाण यह है कि सरस्वती से पूषा के समान धन देने की बात कही गयी है। पूषा अन्नों के स्वामी (वाजानां पतिः सर्वेषामन्नानां पतिः.) हैं, पोषण के संवर्द्धन हैं (पुष्टीनां सखा)। ऋग्वेद में कवि प्रार्थना करता है कि ‘तुझे छोड़कर हमें दूसरे खेतों में जाना न पड़े ऐसा कर।’ सातवलेकर महोदय क्षेत्राणि का तात्पर्य खेत से करते हैं।
सरस्वती हमें पवित्र करने वाली है, वह अन्नों में अन्नवती है (पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती)। पावक शब्द कालान्तर में अग्नि के लिये प्रयुक्त होने लगा। लेकिन यह शब्द सरस्वती के लिये विशेषण के रूप में प्रयुक्त है। सरस्वती के अन्नपूर्ण रूप, उसकी भौतिक समृद्धि, सर्जक भूमिका और उसके पावक रूप में कोई प्रामाणिक विरोधाभास नहीं लगता है। ऋग्वेद में कहा गया है कि सरस्वती का आह्वाहन देवोपासक करते हैं, उसका स्मरण यज्ञ के अवसर पर करते हैं, सुकृती जन उसे पुकारते हैं। वह पितरों के साथ आगमन करें, कुशासन पर बैठकर प्रसन्न हों। मनुष्य ही नहीं, इन्द्र भी अपनी थकान दूर करने के लिये सरस्वती के निकट आते हैं। सभी नदियाँ मनुष्य को पवित्र करती हैं, केवल सरस्वती बुद्धि को निखारती है। जो कवि यशस्वी नहीं हैं, उसे यशस्वी बना सकती है। कवियों का आत्मीय सम्बन्ध जैसा सरस्वती से है, वैसा अन्य किसी नदी से नहीं है।
