December 2025

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साहित्य में सरस्वती नदी घाटी सभ्यता(Saraswati River Valley Civilization in Literature)

इतिहास का कोई धर्म नहीं होता, वह निरपेक्ष होता है। इसलिए इतिहास को निपरेक्ष होना चाहिए, यदि वह निरपेक्ष नहीं तो वह इतिहास नहीं है। प्राचीन भारतीय इतिहास के साथ भी यही बात रही। विज्ञान के इस युग में सामाजिक ज्ञान प्राचीन ज्ञान की अपेक्षा अग्रेतर है। नव.पुरातन मान्यताओं और तर्काें की कसौटी पर रखते हुए नये.नये परिणाम खोजे जा रहे हैं और नये.नये विचारों को स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है। सरस्वती नदी, उसके प्रवाहित मार्ग, उसके तटों पर पनपी और विकसित हुई और पुनः उजड़कर विलुप्त हुई सभ्यता एवं संस्कृति और उसकी प्रथा-परम्परा, इतिहास, भूगोल, समाज, मानव- जाति, रहन.सहन, व्यवसाय, वेशभूषा, आस्था-विश्वास, धार्मिक जीवन, मृद्भाण्ड आदि के विषय में निरन्तर खोज करने और अधिकाधिक ज्ञान प्राप्त करने के लिये विद्वत समाज वर्षों से अनवरत प्रयास कर रहा हसंस्कृति मानव समाज की अमूल्य निधि होती है। मानव इसलिये मानव है कि उसके पास संस्कृति है। संस्कृति के अभाव में मानव मानव नहीं, पशु के समान होता है। मनुष्य में कुछ ऐसी शारीरिक क्षमताएँ विद्यमान होती हैं, जिसके कारण वह संस्कृति का निर्माता होता है। मानव ही संसार में एक ऐसा प्राणी है, जो अपनी क्षमताओं और विशेषताओं के कारण सभ्यता और संस्कृति का निर्माण कर पाया।प्राचीन विश्व की अनेक सभ्यताएँ एवं संस्कृतियाँ प्रायः नदियों के किनारे ही विकसित हुई। उनकी कृषि, पशुपालन, नगर-नियोजन, धार्मिक जीवन, साहित्य, कला आदि का विकास सब कुछ नदी घाटी के किनारों पर ही पल्लवित एवं पुष्पित हुए। प्राचीन भारत में तो सभी प्रारम्भिक और छोट-.बड़े साहित्यिक ग्रन्थों जैसे वेद, उपनिषद्, ब्राह्मण, आरण्यक, दर्शन आदि में से अधिकांश की रचना सरस्वती नदी घाटी में ही लिखे गये। जिसके कारण ही सरस्वती विद्या की देवी कहलायी। कृषि की अधिष्ठात्री देवी सीता, इसी सरस्वती का ही एक रूप है। इसी तरह पलक्षा नदी का दैवीय रूप लक्ष्मी है। ऋग्वेद के साक्ष्यों से भी ऐसा प्रतीत होता है कि सरस्वती का ही वर्तमान स्वरूप लक्ष्मी में विद्यमान है।एशिया की सभ्यताएँ विश्व की प्राचीन सभ्यताएँ हैं। यहाँ की प्राचीन सभ्यताएँ किसी.न.किसी नदी के किनारे ही विकसित हुई। मिस्र की सभ्यता नील नदी के किनारे, भारत की सबसे पुरानी सभ्यता सिन्धु एवं सरस्वती नदी घाटी में तथा निकट पूर्व की सबसे प्राचीन सभ्यता दजला और फरात नदियों के किनारे पर ही विकसित हुई। इसी प्रकार चीन की सभ्यता ह्वांगहों और यांग-टी-सी-क्यांग के किनारे विकसित हुई। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि एशिया की सभी सभ्यताएँ, जो कि विश्व की प्राचीन सभ्यताएँ हैं, नदी घाटी के किनारे पर ही विकसित हुईं। ऋग्वेद में सरस्वती नदी का उल्लेख उत्तर पश्चिमी भारत में एक महान् और पवित्र नदी के रूप में मिलता है। 20वीं शताब्दी ईसवी के प्रारम्भ में पुरातत्त्ववेत्ताओं और भू.वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन के उपरान्त यह सिद्ध करने का प्रयास किया और बताया कि ऋग्वेद में वर्णित सरस्वती नदी का समीकरण घग्घर (घग्गर) हाकरा नदी से किया जा सकता है। क्रिश्चियन लासेन, मैक्समूलर, आरेल स्टाइन, सी.एफ. ओल्डन और जेन मंैकिटोस आदि विद्वानों ने सरस्वती नदी का समीकरण घग्गर-हाकरा नदी से करते हैं। डेनिनों का मत है कि ‘घग्गर-हाकरा का विस्तार सरस्वती का अवशेष था।’ फिलिप, विरदी और वी. के. एस. वाल्डिया महोदय ने सरस्वती का समीकरण घग्गर से स्थापित करने का प्रयास किया है। ग्रेगरी पोसेहल नामक विद्वान् का मत है कि ‘भाषाई’, पुरातात्त्विक और ऐतिहासिकता के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि वैदिक साहित्य में वर्णित सरस्वती नदी का समीकरण वर्तमान घग्गर या हाकरा से स्थापित किया जा सकता है।सरस्वती घाटी सभ्यता एवं संस्कृति को विश्व पटल पर लाने के लिए भारत सरकार के द्वारा पूर्व में श्री जगमोहन (पूर्व केन्द्रीय मंत्री) ने एक चार सदस्यों वाली विशेषज्ञ समिति का गठन किया था। इस विशेषज्ञ समिति में स्पेश एप्लीकेशन सेन्टर के पूर्व डिप्टी डायरेक्टर श्री बलदेव सहाय, श्री वी. एम. पुरी, ज्योलाजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया, लखनऊ, डॉ. एस.कल्याणरत्नम, एशियन डेवलेपमेंट बैंक के पूर्व सीनियर एक्जीक्यूटिव श्री माधव चितलें, पूर्व सेक्रेटरी, ग्राउण्ड वाटर मैनेजमेण्ट की अध्यक्षता में आदिबद्र्री से भगवानपुर, सिरसा होते हुए कालीबंगन तक पुरातात्विक उत्खनन एवं अन्य सम्बन्धित कार्यों को करने की योजना बनायी गयी। यह सम्पूर्ण कार्य योजना को दो चरणों में सम्पादित किया गया। यद्यपि भारतीय इतिहास संकलन समिति के तत्त्वाधान में 1993 ई. में विलुप्त या सूखी हुई सरस्वती नदी को ढूढ़ने खोजने का कार्य प्रारम्भ किया गया था। तब से लेकर आज तक निरन्तर विद्वानों, इतिहासकारों, पुरातत्त्वेत्ताओं, भू.वैज्ञानिकों, लेखकों आदि द्वारा सरस्वती नदी से सम्बन्धित साक्ष्यों, स्थानों आदि को खोजने-लिखने के लिये कार्य किया जा रहा है। इस कार्य में श्री सी. एन. ओल्डहेन, श्री आरेल स्टाइन, डॉ0 बी.बी. लाल, श्री आर. एसण्. विष्ट, श्री के. जी. गोस्वामी, श्री रविप्रकाश आर्य, डॉ0 अशोक साहनी, श्री ओ. पी. भारद्वाज, श्री के. एफ. दलाल, श्री बी. घोष, श्री जे. एस. खत्री, श्री एम. आचार्य, श्री भगवान सिंह, श्री देवेन्द्र स्वरूप, श्री आर. सी. ठाकरान, श्री जगपति जोशी, श्री आर. एस. शर्मा, श्री के. सी.् यादव आदि अनेक विद्वानों, पुरातत्त्वविदों, वैज्ञानिकों, लेखकों आदि का योगदान सरस्वती नदी को बूढ़ने में सराहनीय रहा। जिससे भारतीय इतिहास को एक नया आयाम मिला।साहित्य में सरस्वती-ऋग्वैदिक संस्कृति का मूल केन्द्र पंजाब से पूरब की ओर सरस्वती और दृषद्वती नदियों के मध्य भाग तक सीमित था। मनु महोदय ने इसे ब्रह्मावर्त कहा है। यथा-सरस्वतीदृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम् । तं देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावर्त प्रचक्षते।। ऋग्वेद में लगभग 40 नदियों के नाम का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद के नदी सूक्त में 21 नदियों का विवरण मिलता है। पहली गंगा और अन्तिम गोमल (गोमती) है। ऋग्वैदिक सभ्यता एवं संस्कृति का विस्तार कुरुक्षेत्र तक था। आर्यों के राज्य की सीमा का विस्तार कुरु-पांचाल तक हो गया था। सात प्रमुख नदी में से एक नदी सरस्वती है। यह नदी पुण्य सलिला है। कोई भी पूजा आदि करने के पहले इस नदी का आहवाहन करना आवश्यक होता है। यथा-गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन सन्निधिं कुरु।।ऐसी मान्यता है कि पूजा के लिये प्रयुक्त होने वाले जल में उक्त 7 पुण्यसलिला नदियाँ अवस्थित है। ऋग्वेद के मंत्रों में सरस्वती नदी की दिव्य महिमा का वर्णन मिलता है। इस नदी के साथ अनेक ऐतिहासिक, धार्मिक तथा आध्यात्मिक घटनाएँ जुड़ी हैं।ऋग्वेद के मंत्र 10/64/8-9 में 21 नदियों की चर्चा मिलती है। जिसमें सरस्वती, सरयू और सिन्धु का दैवी नदी तथा माता के रूप में उल्लेख...
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भारतीय सिक्कों की प्राचीनता(Antiquity of Indian coins )

प्राचीन भारतीय इतिहास के विकास में साहित्य की भाँति पुरातात्विक स्रोतें का विशेष योगदान रहा है। प्राचीन सिक्कों से लुप्त ऐतिहासिक घटनाओं को उद्घाटित करने में सहायता मिलती है। सिक्के इतिहास लेखन में एक महत्वपूर्ण उपकरण माना जाता है। जैसे मानव आदिम, जंगली जीवन से हटकर आवासीय समुदायों की ओर अग्रसर हुआ वैसे ही सामाजिक नियमों और भौतिक प्रगति किया। विकास पथ पर द्रुतगति से अग्रसरित मानव जाति को अपने व्यावहारिक जीवन में वस्तु विनिमय की अपेक्षा मुद्रा की आवश्यकता की प्रतीति कालक्रमेण देर से हुई। वस्तु विनिमय प्रणाली केरूपान्तर आज भी आधुनिक भारतीय समाज में विद्यमान हैं, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ दैनिक आश्यकता की वस्तुओं को अनाज, पुराने कपड़े या पशुधन के बदले प्राप्त किया जाता है। वास्तव में मुद्रा का सम्बन्ध व्यवहार से जुड़ा हुआ है। विदेशी विद्वानों की मान्यता रही है कि सिकन्दर के आगमन के बाद भारत में सिक्कों का प्रचलन हुआ। लेकिन पुरातात्विक उत्खनन से लब कार्षापण सिक्कों का पता चला तो विदेशी विद्वानों की धारणा खण्डित हो गयी। सत्य तो यह है कि भारत में प्राचीन काल से सिक्कों का प्रचलन हो गया था। अतः मुद्रा निर्माण के इतिहास को निम्नलिखित युगों में विभाजित करके उन पर विस्ताार से विचार किया जाना आवश्यक है।मुद्रा निर्माण के इतिहास का युग निम्नलिखित है- (ब) सुवर्ण निष्क का भी गोपथ ब्राह्मण में वर्णन मिलता है, जिसमें कहा गया है कि कुरु-पांचाल के ऋषि उद्दालक आरुणि ने अपने ध्वज में निष्क धारण किया था। उनकी घोषणा थी कि जो उन्हे शास्त्रार्थ में पराजित करेगा, उसे वे ‘निष्क’ देंगे।स्पष्ट है कि यहाँ भी निष्क का प्रयोग क्रय-विक्रय के प्रसंग में नहीं है।(स) छान्दोग्योपनिषद में एक राजा के किसी ऋषि से अध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति हेतु 1000 रथ, 10000 गाय, 1000 गाँव एवं 1 निष्क देने की घोषणा का उल्लेख है।यहाँ वस्तुओं की तुलना में निष्क पर्याप्त मूल्यवान दिखाई देता है। परन्तु कहीं भी विनिमय का संकेत नहीं है।(2) शतमान – शतमान तत्कालीन समय में दक्षिणा के रूप में प्रयुक्त होता था।‘‘तस्य वै भीणि शतमानानि हिरण्यानि दक्षिणां।’’राजसूय यज्ञ के अवसर पर रथ दौड़ में रथ के पहिए में दो शतमान बांधे जाते थे। जो कालान्तर में दक्षिणा में दे दिए जाते थे। शतमान को एक स्थल पर वृत्ताकार बताया गया है। अन्यत्र शतमान के 100 वर्ष के जीवन व्यतीत करने के लिए यज्ञकर्ता द्वारा शतमान देने का उल्लेख है- ‘शतमानं भवति शतायुर्वे पुरुषः।’(3) सुवर्ण ? – परवर्तीकाल में सुवर्ण 80 रत्ती या 144 ग्रेन का सिक्का था। उत्तर वैदिक काल में शतमान के विकल्प के रूप में इसे दिया जाना, इसके निश्चित की सूचना देता है।(4) पाद- उत्तर वैदिक काल में ‘पाद’ का भी वर्णन मिलता है जिसका अर्थ 1.5 या आधा होता था। वृहदारण्यक उपनिषद में राजा जनक द्वारा 100 गायों के दान करने का उल्लेख है, जिनमें से प्रत्येक गाय की सींग में 10 पाद बँधे हुए थे।पतंजलि ने ‘पादनिष्क’ या ‘पनिष्क’ का वर्णन किया है। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि उत्तर वैदिक साहित्य में ‘निष्क’, ‘सुवर्ण’, ‘शतमान’ व ‘पाद’ का उल्लेख दान के प्रसंग में मिलता है न कि क्रय-विक्रय के प्रसंग में। इन पर कोई राज्योचित चिन्ह मिलता है या नहीं, अभी अस्पष्ट है। इनके निश्चित तौल के विषय में भी हम अनभिज्ञ हैं। प्रायः गायें अब भी वस्तु विनिमय की साधन थी।(5) कृष्णल- तैत्तरीय ब्राह्मण में कृष्णल का उल्लेख मिलता है।‘कृष्णलं कृष्णलं वाजसृदभयः प्रयच्छर्ति।रत्ति (रत्तिका) को कृष्णल कहते थे। वास्तव में रत्ति पेड़ का फल है, किन्तु इसका अर्थ यह है कि स्वर्ण-पिण्ड से काटकर एक-एक रत्ती दिया जा रहा हो। कृष्ण्ल कोई सिक्का नहीं हो सकता, क्योंकि परवर्तीकाल में यह सिक्का नहीं था।
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